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अंग्रेजों से जीता पर कोरोना से हारा नौचंदी मेला


अंग्रेजों से जीता पर कोरोना से हारा नौचंदी मेला

ऐतहासिक नौचंदी मेले पर कोरोना की मार
लगातार दूसरे साल नहीं होगा मेले का आयोजन

सुनील शर्मा

मेरठ। अंग्रेजी शासनकाल में तमाम जुल्मों का सामना कर भी सीना तानकर लगने वाला ऐतहासिक नौचंदी मेला कोरोना से हार गया। कोरोना की दूसरी लहर ने लगातार दूसरे साल नौचंदी मेले का आयोजन रद करा दिया है। नौचंदी मेला न लगने से कारोबार की उम्मीद लगाये व्यापारियों से लेकर नौचंदी मेले में आने का अरमान मन में लिये लोगों को निराशा का सामना करना पड़ रहा है।

उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक ऐतहासिक नौचंदी मेला का शुभारंभ होली के बाद आने वाले दूसरे रविवार को किया जाता है। इस साल 11 अप्रैल को नौचंदी मेला का उद्घाटन किया जाना था जिसको लेकर तैयारियां भी शुरू कर दी गयीं थीं। मगर मेरठ जिले में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों और नौचंदी मेला में मेरठ सहित अन्य शहरों से आने वाले लोगों में कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका के चलते मेरठ जिला प्रशासन ने इस साल नौचंदी मेला का आयोजन न कराने का फैसला लिया है। मेरठ की महापौर सुनीता वर्मा ने भी जिला प्रशासन को पत्र लिखकर नौचंदी मेला इस साल भी रद करने की मांग की थी।


हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है नौचन्दी मेला
उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध मेलों में शामिल नौचन्दी मेला का आयोजन प्रत्येक वर्ष हर्षोल्लास के साथ किया जाता है। 350 साल से आयोजित किया जा रहा हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक नौचन्दी मेला परिसर में हजरत बाले मियां की दरगाह एवं नवचण्डी देवी (नौचन्दी देवी) का मंदिर आमने-सामने है। मंदिर के घंटों की आवाज और दरगाह से गूंजती आजान की आवाज एक साथ मिलकर सांप्रदायिक अध्यात्म की प्रतिध्वनि देती है। यह प्रतीक है गंगा-जमुनी तहजीब का, हिंदू-मुस्लिम सौहार्द का जिसे मिटाने का प्रयास करने में अंग्रेजी शासनकाल भी नाकाम रहा था। एक माह तक चलने वाले नौचंदी मेला में बड़ी संख्या मंे स्वतंत्रता सेनानी भी जमा होते थे और अंग्रेेजों का मुकाबला करने की रणनीति बनाते थे। उनपर निगाह रखने के लिये अंग्रेजों के मुखबिर भी मेले में मौजूद रहते थे। अंग्रेज शासकों ने नौचंदी मेला की राह में अनेक बार रोड़े अटकाये मगर हिंदू-मुस्लिम के एक साथ खड़े होने के कारण वह हर बार नाकाम रहे। गुलाम भारत से आजाद हिंन्दुस्तान तक नौचंदी मेले ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे मगर ऐसा कभी नहीं हुआ कि मेरठ में नौचंदी मेले का आयोजन न हुआ हो। लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते पिछले साल लगे लाॅकडाउन और अब कोरोना की दूसरी लहर के कारण लगातार दूसरे साल नौचंदी मेला का आयोजन नहीं होगा। हालांकि परंपरा निर्वहन के लिये नौचंदी मेले का प्रतीकात्मक उद्घाटन किया जायेगा मगर नौचंदी मेले में दुकाने लगाने या कारोबार करने की अनुमति नहीं होगी।


पूरी रात चलता था नौचंदी मेला, दूसरे जनपदों से भी आते थे लोग
नवचंडी मंदिर मंे भजन कीर्तन, बाले मियां की मजार पर कव्वाली और कवि सम्मेलन, मनोरंजन के लिये सर्कस से लेकर नौटंकी तक के बड़े-बड़े तंबू, विभिन्न राज्यों के खान-पान के स्टाॅल, भारतीय संस्कृति को संपूर्ण झलक दिखती थी ऐतहासिक नौचंदी मेले में। देश के विभिन्न राज्यों से आये व्यापारी अपने उत्पादों को बेचा करते थे। अंगे्रजी शासनकाल में नौचंदी मेले के दौरान बहुत बड़ा पशु मेला भी लगता था जिसमें अरबी घोडे़ तक बेचे जाते थे। कहा जाता है कि उस वक्त अंग्रेजी सेना के लिये घोड़े भी इसी पशु मेले से खरीदे जाते थे। नौचंदी मेले के एक माह तक शहर रात भर जागता था। सिनेमाघरों में सारी रात फिल्मों के शो चलते थे। गांव-देहात से लेकर दूसरे शहरों से आने वाले लोग सारी रात नौचंदी मेले में रूकते थे और रात भर मेला गुलजार रहता था। भारत के आजाद होने के बाद लगने वाले नौचंदी मेले में आयोजित इंडो-पाक मुशायरे में हिंदुस्तान के साथ पड़ोसी मुल्क के शायर भी मंच पर मौजूद रहते थे। ऐतहासिक नौचंदी मेले की लोकप्रियता को देखते हुए भारतीय रेलवे ने मेरठ से लखनऊ जाने वाली एक ट्रेन का नाम भी नौचंदी एक्सप्रेस रखा हुआ है।

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