Big Blow: आज़म के बेहद करीबी फसाहत शानू ने थामा भाजपा का दामन

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समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ और दिग्गज नेता आज़म खान के लिए आज का दिन किसी बड़े झटके से कम नहीं है. उनके बेहद करीबी रहे और उनके मीडिया इंचार्ज रहे फसाहत अली खान उर्फ़ शानू ने आज साइकिल की सवारी से उतरकर भाजपा के रथ पर सवार हो गए है. दरअसल फसाहत की पहचान सपा से कम और आज़म खान से ज़्यादा है और इसलिए फसाहत का भाजपा में जाना आज़म खान का व्यक्तिगत नुक्सान माना जा रहा है.

आज़म खान के लिए बड़ा झटका

बता दें कि आज़म खान से विधायकी छिनने के बाद भाजपा इस बात पर ज़ोर लगा रही है यह सीट समाजवादी पार्टी से छीन ली जाय, इसी कड़ी में भाजपा को आज एक बड़ी कामयाबी मिली और हमला सीधा आज़म खान पर किया, फसाहत अली खान ने आज रामपुर में भाजपा उम्मीदवार आकाश सक्सेना के कार्यालय में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी के हाथों भाजपा की सदस्यता ग्रहण कि, फसाहत के साथ और भी कई लोग जो आज़म खान के काफी करीबी माने जाते थे वह भो भाजपा में चले गए.

फसाहत पर दर्ज हैं दो दर्जन मुक़दमे

फसाहत अली खान पर भी आज़म खान की तरह दर्जनों मुक़दमे दर्ज हैं, प्रशासन उन्हें जिला बदर भी कर चुका है. यह वही फसाहत अली कहाँ हैं जो सपा के चुनाव हारने के बाद पार्टी मुखिया अखिलेश पर लगातार हमलावर रहे हैं, शानू इससे पहले कई बार कह चुके हैं मुख्यमंत्री बनने की बात हो या फिर opposition लीडर, बनना तो अखिलेश को ही है, अब्दुल तो पहले भी दरी बिछाता था और आगे भी दरी बिछायेगा। उस वक्त कहा गया था कि शानू ने किसी के इशारे पर यह बयान दिया है क्योंकि उस वक्त आज़म खान और अखिलेश के रिश्ते काफी खटास भरे बताये जाते थे. फसाहत ही वह नेता थे जिन्होंने कहा था कि अखिलेश चाहते ही नहीं आज़म खान जेल से बाहर निकले।

सपा में नहीं मिल रहा था सम्मान

फसाहत खान ने भाजपा में सदस्यता लेने के समय समाजवादी पार्टी को छोड़ने की जो वजह बताई उसके मुताबिक वहां उनको सम्मान नहीं मिल रहा था, इसके अलावा वह प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की नीतियों और योजनाओं से बहुत प्रभावित हैं , हालाँकि उन्होंने आज़म खान के बारे में कुछ नहीं कहा. बता दें कि रामपुर विधानसभा उपचुनाव 5 दिसंबर को है, समाजवादी पार्टी ने यहाँ से आज़म खान के ख़ास आसिम रज़ा को उम्मीदवार बनाया है. बताया जा रहा है कि फसाहत इस उपचुनाव में लड़ना चाह रहे थे लेकिन न ही आज़म और न ही समाजवादी पार्टी ने उनको इस काबिल समझा, ऐसे में उन्हें सपा में अपना भविष्य अंधकारमय ही लगा, साथ ही दो दर्जन मुकदमों का बोझ सहन करने में अब उन्हें परेशानी भी होने लगी थी.

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