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न रोको भावनाओं को, बहने दो आंसूू


न रोको भावनाओं को, बहने दो आंसूू

अनुश्री पैन्यूली

रोना या आँसू बहाना शरीर की एक प्राकृतिक प्रक्रिया या नेचुरल प्रोसेस है जो की सीधे तौर से हमारी भावनाओं से जुड़ी है। परन्तु कमाल की बात यह है की समाज़ ने इसे कईं दायरों में बाँध दिया है।

जैसे – बहादुर लोग नहीं रोते।

यह बातें अटपटी होने के बावजूद भी हमारे समाज का गहरा हिस्सा हैं ।
हमारे लिए यह समझना आवश्यक है की शरीर की किसी भी प्राकृतिक प्रक्रिया के ही सामान सही समय पर आँसुओं का निकलना भी ज़रूरी है और उनको ज़बरदस्ती रोकने से व्यक्ति को कईं प्रकार की दिक्कतें हो सकती हैं। यह दिक्कतें भावनात्मक सिरे यानी इमोशनल फ्रंट से शुरू होती हैं पर समय के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक स्तर तक पहुँच जाती हैं।

साथ ही रोने का बहादुरी, कोमलता ,स्त्री -पुरुष भेद से सरोकार नहीं है। समझ लीजिये यह नींद के जैसे है, सबके शरीर में ही सोने की प्रक्रिया एक सामान है परन्तु हर व्यक्ति अपने शरीर की प्रवर्ति के अनुरूप सोता है। किसी को अधिक नींद चाहिए होती है तो किसी को कम । कोई काम के बीच थोड़ी देर आँख मूँद तरोताज़ा हो जाता हैं तो कोई बहुत थका होने के बावजूद भी यह नहीं कर पाता । इसलिए ऐसी प्रक्रियाओं का कोई बुद्धिहीन मापदंड बना लेना और उस पर लोगों को तोलना सर्वथा अनुचित है।

इसमें हम क्या कर सकते है – अपने रोने पर किसी प्रकार की शर्मिंदगी न महसूस करें, ठीक वैसे ही जैसे की साँस लेने पर नहीं करते। आँसू लिंग भेद नहीं करते इसलिए आप भी न करें और अपने बच्चों को भी यह भेद न सिखायें। आपके सामने कोई भावुक होकर रो जाये तो उसे समझने का प्रयास करें। न तो स्वयं उसका मज़ाक बनाये न ही किसी और को बनाने दें। यह न भूलें कि ऐसी परिस्थिति में कोई आपका मज़ाक बनाएगा तो आप कैसा महसूस करेंगे।

भावनाओं की इस स्वछंद प्रक्रिया को स्वछंद ही रहने दें , व्यर्थ सामाजिक बेड़ियों में न बाँधें।

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