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बिहार चुनाव में रहा है बाहुबलियों का राज


बिहार चुनाव में रहा है बाहुबलियों का राज

अमित बिश्‍नोई

न्यूज डेस्क ।राजनीति और अपराध का दशकों पुराना रिश्ता है। राजनीतिक दल ऊपरी तौर पर भले ही राजनीति के अपराधिकरण की पुरजोर निंदा करें लेकिन हकीकत यह है कि लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव जीतने के लिये बाहुबलियों का सहारा लिया भी है और उन्हें पार्टी टिकट पर चुनाव लड़वाया भी है। राजनीति में बाहुबलियों का दबदबा समझने के लिये बिहार चुनाव पर नजर डालना जरूरी है। क्योंकि बिहार ने अनेक ऐसे बाहुबलियों को राजनीति में आने का मौका दिया जिनका दबदबा दशकों तक रहा। और जब वह चुनाव नहीं लड़ पाये तो उन्होंने अपनी पत्नी या परिवार के सदस्यों को चुनावी मैदान में आगे कर सत्ता सुख भोगा है।

बिहार चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतरने को कमर कस चुके हैं। लेकिन चुनाव के शोरगुल में बाहुबलियों को अपने पाले में खींचने का काम भी गुपचुप तौर पर किया जा रहा है। और बिहार की जनता के लिये यह कोई नयी बात नहीं है। क्योंकि बिहार चुनाव में बाहुबलियों का पलड़ा हमेशा से भारी रहा है। हर राजनीतिक दल की पसंद ये बाहुबली 80 के दशक तक प्रत्याशियों को चुनाव जिताने में मदद किया करते थे। वोटरों को धमकाना, बूथों पर कब्जा करना और प्रतिद्धंदी प्रत्याशी को डरा कर रखने से लेकर उसकी जान तक लेने का काम यह बाहुबली ही करते थे।

उस दौर में बाहुबलियों को राजनीतिक संरक्षण की जरूरत थी और नेताओं को चुनाव जीतने के लिए इनके बाहुबल की आवश्यकता थी। यह 1990 के दशक में बिहार के बड़े हिस्से में अपने खौफ से चुनाव को प्रभावित करने वाले बाहुबली अशोक सम्राट के पास एके 47 थी। बेगुसराय में जन्में अशोक सम्राट की तूती गोरखपुर तक बोलती थी और वह किसी को भी चुनाव जिताने या हराने की कुव्वत रखता था। 90 के दशक में दबंगों का बिहार की राजनीति में दखल बढ़ने लगा। सत्ता के ईद-गिर्द रहने वाले बाहुबलियों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागृत हुई और उन्होंने औरों को चुनाव जिताने की बजाये खुद चुनाव लड़ने की ठान ली। इनमें से कई बाहुबली ऐसे थे जिन्होंने दशकों तक सत्ता सुख भोगा। कई बाहुबली ऐसे हैं जो जेल में रहते हुए चुनाव लड़े और जीते या उन्होंने अपनी पत्नी या किसी और को एकतरफा चुनाव जिताया है।

राजनीति के इस अपराधिक हमाम में सभी दल नंगे दिखाई देते हैं। कांग्रेस ने सबसे पहले बाहुबली दिलीप सिंह को टिकट देकर चुनाव लड़वाया। जयराम की दुनिया से निकल कर राजनीतिक गलियारों तक पहुंचे दिलीप सिंह ने अन्य अपराधिक छवि वाले दबंगों को राजनीति की राह दिखाई तो राजनीतिक दलों को दबंगई के सहारे जीत हासिल करने का तरीका समझाया। ऐसे ही एक बाहुबली सीवान के मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 1990 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की। लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम-यादव के राजनीतिक समीकरण को पूूरा करने के लिये शहाबुद्दीन को राजद में शामिल करा लिया।

लालू-राबड़ी के शासन काल में शहाबुद्दीन का नाम अनेक अपराधिक कृत्यों में आने के बावजूद बावजूद पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने का प्रयास तक नहीं किया। 2001 में शहाबुद्दीन को पकड़ने के प्रयास में हुई गोलाबारी में दो पुलिसकर्मियों सहित दस लोगों को अपनी जान गवानीं पड़ी मगर शहाबुद्दीन पुलिस के हाथ नहीं आया। मोहम्मद शहाबुद्दीन ने दो बार विधानसभा और चार बार लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की है। मोहम्मद शहाबुद्दीन आज सिवान के दो भाइयों को तेजाब से नहलाकर मार डालने वाले तेजाब हत्याकांड व चश्मदीद की हत्या में संलिप्तता के आरोप में दिल्ली की तिहाड़ जेल बंद है। फिर भी राजद का शाहबुद्दीन के प्रति कम नहीं हुआ और राजद ने शाहबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब को भी टिकट देकर चुनाव लड़वाया। शाहबुद्दीन को टक्कर भी एक और बाहुबली अजय सिंह से मिली जिनकी पत्नी कविता सिंह ने हिना शहाब को पराजित कर ही लोकसभा का चुनाव जीता।

बाहुबलियों का जिक्र हो और मशरख (सारण) विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल करने वाले प्रभुनाथ सिंह की चर्चा न हो ऐसा हो नहीं सकता। प्रभुनाथ सिंह कभी नीतीश कुमार तो कभी लालू प्रसाद यादव के चहेते बनकर सत्ता सुख भोगते रहे। यह प्रभुनाथ सिंह का ही जलवा था की उनके भाई केदारनाथ सिंह बनियापुर (सारण), बेटे रणधीर सिंह छपरा (सारण), समधी विनय सिंह सोनपुर (सारण) और बहनोई गौतम सिंह मांझी (सारण) से विधायक रह चुके हैं। विधायक अशोक सिंह की हत्या के आरोप में प्रभुनाथ सिंह भले ही आजीवन कारावास की सजा काट रहे हों लेकिन पूरे बिहार में उनकी दबंगई आज भी कायम है।

मोकामा के विधायक अनंत सिंह पर भी रंगदारी, हत्या व अपहरण के 30 से अधिक मामले दर्ज हैं। भाई दिलीप सिंह की हत्या के बाद अनंत सिंह ने राजनीति में कदम रखा और 2005 में पहली बार विधायक बने। अनंत सिंह और नीतीश कुमार के संबंधों की चर्चा बिहार की राजनीतिक गलियारों में खूब होती रही। अनंत सिंह एके-47 रखने के आरोप में पटना की बेउर जेल में बंद हैं लेकिन उनका दबदबा पूरे जिले में कायम है।

1990 में पहली बार सहरसा से विधायक बने आनंद मोहन दो बार सांसद भी बने। वर्तमान में आनंद मोहन गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। लेकिन उनकी पत्नी लवली आनंद चुनाव लड़ कर सांसद बनने में कामयाब रहीं। वहीं लालू यादव के काफी करीबी रहे पप्पू यादव मधेपुरा जिले की सिंहेश्वर विधानसभा क्षेत्र से 1990 में पहली बार विधायक बने। एक बार सत्ता का सुख भोगा तो उनकी महत्वकांक्षाएं बढ़ गयीं और उन्होंने सांसद का चुनाव लड़कर कई बार जीत हासिल की। पप्पू यादव को पूर्णिया के माक्र्सवादी विधायक अजीत सरकार की हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। बाहुबली पप्पु यादव इस बार भी चुनावी मैदान में उतरने को कमर कस चुके हैं। बाहुबलियों की सूूची में सांसद रहे सूरजभान सिंह (बेगूसराय) व रामा सिंह (वैशाली), विधायक रहे सुनील पांडेय (भोजपुर), राजन तिवारी (चंपारण), मुन्ना शुक्ला (वैशाली), सुरेंद्र यादव (जहानाबाद) एवं बीमा भारती के पति अवधेश मंडल (पूर्णिया), पूनम यादव के पति रणवीर यादव (खगड़िया), गुड्डी देवी के पति राजेश चैधरी (सीतामढ़ी) व गोपालगंज के कुचायकोट से निवर्तमान जदयू विधायक अमरेंद्र पांडेय का नाम भी शामिल है।

राजनीति में अपराधियों के आगमन को रोकने के लिये सन 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने किसी मामले में दोषी ठहराये गये व्यक्ति को चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य घोषित कर दिया था। मगर राजनीतिक दलों की जीत की भूख और बाहुबलियों की राजनीतिक महत्वकांक्षाओें ने इस प्रयास को नाकामयाब कर दिया। जेल में बंद या चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य बाहुबलियों ने अपनी पत्नी या परिवार के सदस्य को चुनाव लड़वाया और उनकी जीत के बाद सत्ता सुख भोगा है। जाहिर है कि राजनीति के गलियारों में बाहुबलियों की इंट्री सिर्फ राजनीतिक दलों के प्रयासों से ही संभव हो सकती है। यदि वह बाहुबलियों को टिकट न दे ंतो उनका राजनीति में सफल होना मुश्किल हो सकता है। वहीं जनता को भी इन बाहुबलियों के आतंक को दूर करने के लिये उन्हें वोट देकर जिताना बंद करना होगा। तभी राजनीति का शुद्धीकरण हो सकेगा।

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