उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों पर हाईकोर्ट का निर्णय आ चूका है. निर्णय के मुताबिक प्रदेश में निकाय चुनाव अब बिना ओबीसी आरक्षण के कराये जायेंगे, इस बारे में प्रदेश सरकार द्वारा जारी किये गए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को खारिज कर दिया गया है और राज्य सरकार को पहले की व्यवस्था के तहत निकाय चुनाव कराने का आदेश जारी किया है. इलाहाबाद हाईडकोर्ट की लखनऊ बेंच के जज न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया ने इस मुद्दे पर दाखिल 93 याचिकाओं पर एक साथ आदेश पारित किया है.
सुप्रीम कोर्ट जा सकती है योगी सरकार
इस निर्णय के बाद अब कहा जा रहा है कि योगी सरकार इस मुद्दे को प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है. अदालत के आदेश के बाद प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इस मसले पर विशेषज्ञों से कानूनी सलाह लेने की बात कही है. याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता एलपी मिश्रा ने कहा कि शहरी स्थानीय निकायों में ओबीसी को दिया जाने वाला आरक्षण, शैक्षणिक संस्थानों और सेवाओं में दिए जाने वाले आरक्षण से अलग है. अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता अमिताभ राय ने राज्य सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि रैपिड सर्वे में एकत्रित आंकड़ों के आधार पर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए तैयार आरक्षण उपलब्ध कराया गया है. राज्य सरकार ने म्युनिसिपलिटी एक्ट के प्रावधानों का भी पालन किया है जिसमें स्थानीय निकाय चुनावों में OBC reservation के लिए प्रावधान है.
ओबीसी आरक्षण के लिए कमीशन बनाने का निर्देश
हाई कोर्ट के इस आदेश का मतलब है कि ओबीसी के लिए आरक्षित सभी सीटें जनरल मानी जाएंगी. आदेश में ओबीसी आरक्षण के लिए कमीशन बनाने का निर्देश देने के साथ निकाय चुनाव तत्काल करान के आदेश जारी किये हैं. हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब यूपी में नगर निकाय चुनाव अधिसूचना जारी होने का रास्ता साफ हो गया है, अब देखना है कि राज्य सरकार इस मामले को यहीं पर ख़त्म करती है या फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाकर इसे कुछ और लम्बा खींचती है.
