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पानी की तरह बहाया पैसा, अब बहा रहे आंसू


पानी की तरह बहाया पैसा, अब बहा रहे आंसू

हाईकोर्ट के आदेश के बाद असमंजस की स्थिति में हैं पंचायत चुनाव के भावी प्रत्याशी
दौड़ में रहने को खर्च करना होगा पैसा, आरक्षण बदला तो सारी मेहनत जायेगी बेकार

सुनील शर्मा

न्यूज डेस्क। यूपी पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारियों में महीनों से जुटे और गांव में मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिये पानी की तरह पैसा बहाने वाले अनेक भावी प्रत्याशी खून के आंसू बहा रहे हैं। कारण यह कि पंचायत चुनाव आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट द्वारा दिये गये आदेश के बाद यूपी में राजनीतिक परिदृश्य एक बार फिर से बदल गया है। ऐसे में पंचायत चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं की हालत इधर कुआं तो उधर खाई के बीच फंसे होने जैसी हो गयी है।

पहले ही काफी पैसा चुनाव की तैयारियों में लगा चुके नेताओं को यह भरोसा नहीं हो रहा कि नये सिरे से होने वाले आरक्षण के बाद वह चुनाव लड़ने की स्थिति में होंगे भी या नहीं। ऐसे में वह अपना चुनावी अभियान जारी रखें तो पैसा और समय दोनों खर्च होगा। और यदि वह चुनाव लड़ने की दौड़ में बने रहे तो बीच मझधार में चुनावी अभियान को रोकना उनके लिये नुकसानदेह साबित हो सकता है। ऐसे में असमंजस में पड़े नेताओं के चेहरे पर हवाईयां तैर रही हैं।

उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर काफी समय से ग्रामीण क्षेत्रों में सरगर्मियां तेज हो रही थीं। अपने मतदाताओं के पास जाकर उनको लुभाने, उनकी समस्याएं सुनने और उनको हल कराने में पंचायत चुनाव के भावी प्रत्याशी जोर-शोर से जुटे थे। गांव में विकास कार्य कराने के लिये भी यह भावी प्रत्याशी अपनी जेब से पैसा खर्च कर रहे थे। वहीं चुनावी जनसंपर्क में अपने ईद-गिर्द रहने वाले समर्थकों के खाने-पीने से लेकर पेट्रोल आदि पर भी पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा था। प्रतिद्वंदी प्रत्याशी के वोटरों को अपने पाले में खिंचने के लिये साम और दाम की नीति अपनाने में भी यह भावी प्रत्याशी पीछे नहीं थे। दीवारों को पुतवाने से लेकर इलाके में बैनर-पोस्टर लगवाने का कार्य भी चल रहा था जिनमें वह खुद को भावी प्रत्याशी घोषित कर चुके थे।

मगर हाईकोर्ट की ओर से पंचायत चुनाव आरक्षण को लेकर दिए गए आदेश के बाद पंचायत चुनाव के दावेदार असमंजस में पड़ गये हैं। क्योंकि हाईकोर्ट का आदेश आने के बाद पूरी चुनाव प्रक्रिया पर ही रोक लग गयी है। ऐसे में उन्हें एक बार फिर नये सिरे से घोषित होने वाले आरक्षण का इंतजार करना होगा। इन भावी प्रत्याशियों को अंदेशा है कि यदि आरक्षण में बदलाव किया गया तो उनकी चुनाव लड़ने की सारी तैयारियां और अब तक खर्च हुआ पैसा बेकार चला जायेगा। मगर परेशानी इस बात की भी है कि चुनावी संग्राम में उतरने के बाद रणक्षेत्र से बाहर जाने से उनका वोटर और समर्थक दूसरे प्रत्याशी के पाले में जा सकते हैं। ऐसा हुआ तो आरक्षण में बदलाव न होने पर भी वह मतदाता और समर्थकों से दूर हो जायेंगे। मझधार में फंसे यह भावी प्रत्याशी वो करें तो क्या करें यह सोच-सोचकर परेशान हैं। पंचायत चुनाव के जानकारों की मानें तो नये सिरे से आरक्षण लागू किये जाने पर ग्राम प्रधान के साथ जिला पंचायत सदस्य और ब्लाॅक प्रमुख के आरक्षण पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

राजनीतिक दल और भावी प्रत्याशी तलाश रहे विकल्प
पंचायत चुनाव आरक्षण में बदलाव होने की संभावनाओं के मद्देनजर राजनीतिक दलों ने भी विकल्प तलाशने शुरू कर दिये हैं। पाॅलिटिकल पार्टियां एक्स्ट्रा खिलाड़ी की तरह हर तरह के प्रत्याशी तलाश रही हैं ताकि आरक्षण लागू होने के बाद आवश्यकतानुसार उन्हें तुरंत चुनावी मैैदान में उतारा जा सके। वहीं प्रत्याशी भी महिलाओं के लिये सीट आरक्षित होने की संभावनाओं के चलते परिवार की महिलाओं में से जिताऊ चेहरा तलाश रहे हैं। इससे चुनाव में लगी उनकी मेहनत और पैसा वसूल हो जायेगा और चुनाव भी घर की ही महिला प्रत्याशी के लड़ने से सीट परिवार के पास ही आने की संभावना भी बनी रहेगी। ग्राम प्रधान के साथ जिला पंचायत सदस्य और ब्लाॅक प्रमुख के पदों के लिये आरक्षण लागू होने या आरक्षण से बाहर होने की दशा में चुनावी रणभूमि में उतारने के लिये प्रत्याशियों को तलाश कर रिजर्व में रखा जा रहा है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दल, भावी प्रत्याशियों से लेकर अधिकारी भी नई गाइडलाइन का इंतजार कर रहे हैं।

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