भागवत का बयान

आर्टिकल/इंटरव्यूभागवत का बयान

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अमित बिश्‍नोई

देश में मस्जिदों के नीचे देवी देवताओं को तलाशने और वाराणसी-मथुरा विवाद के बीच संख प्रमुख मोहन भागवत का एक बयान पिछले कई दिनों से चर्चा का केंद्र बना हुआ है, टीवी चैनलों पर डिबेट चल रही हैं, अख़बारों में सम्पादकीय लिखे जा रहे हैं, सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग हो रही है. संघ प्रमुख ने अपने बयान में बहुत सारी बातें कही हैं लेकिन उस बयान की एक दो बातें ज़्यादा चर्चित हुई हैं, पहली बात जो उन्होंने सवालिया अंदाज़ में कही कि सारी मस्जिदों में शिवलिंग की खोज क्यों? और दूसरी बात यह कि ज्ञानवापी मस्जिद विवाद में आरएसएस कोई आंदोलन नहीं करेगा। पहली नज़र में यह दोनों ही बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं. देश में जब साम्प्रदायिक घटनाओं का बोलबाला है ऐसे में संघ प्रमुख के श्रीमुख से कही गयी यह बात स्वागत योग्य है. उनके इस बयान का हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को स्वागत करना चाहिए। संघ प्रमुख के इस बयान को लोग अपने अपने नज़रिये से देख रहे हैं लेकिन हैरानी इस बात की है बहुत से हिन्दू संगठन भागवत जी इस बयान को सही नहीं मान रहे हैं, उनका कहना है उनके बयान को लोग अपने नज़रिये से देख रहे है जबकि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जो लोग समझ रहे हैं. 

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आइये पहले भागवत जी के बयान को देखते हैं कि उन्होंने क्या कहा. भागवत जी ने तीन चार दिन पहले ज्ञानवापी मस्जिद मामले को लेकर कहा था कि आस्था का बड़ा महत्व है लेकिन हर मस्जिद में शिवलिंग की खोज क्यों हो रही है. उन्होंने आगे कहा था कि इस तरह के मामलों में बेहतर यही है कि आपस में बैठकर विवाद को सुलझा लें और अगर बात नहीं बनती है तो फिर अदालत जो फैसला दे उसे खुले मन से सबको मानना चाहिए। अपने इस बयान में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि ज्ञानवापी मामले को लेकर आरएसएस आंदोलन नहीं छेड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि सदियों पहले जो कुछ हुआ था वह इतिहास है और इतिहास को बदला नहीं जा सकता, वह एक सच है लेकिन उस दौर में किये ग़लत कामों की ज़िम्मेदार आज की पीढ़ी नहीं है, हिन्दू धर्म सबको जोड़ता है न कि तोड़ता है और हमें सबको जोड़ना है न कि तोड़ना। यह कुछ मुख्य बातें हैं उनके भाषण की.

अब पहला सवाल यह उठता है कि संघ प्रमुख ने ऐसा बयान क्यों दिया? सभी को मालूम आरएसएस में कुछ भी अचानक नहीं होता, वह एक अनुशासित संगठन है. संघ से जो बात सामने निकलकर आती है वो यूँ ही नहीं होती, उसके पीछे कोई न कोई रणनीति ज़रूर होती है. और जब बात संघ प्रमुख के श्रीमुख से निकली हो तब तो आप इसको हलके में बिलकुल नहीं ले सकते। दरअसल मोहन भागवत जी के बयान को अगर हम गौर से देखें तो वह एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं. एक तो वह अप्रत्यक्ष रूप से मुसलमानों से कह रहे हैं कि वाराणसी और मथुरा की मस्जिदों को वह हिन्दुओं को सौंप दें क्योंकि वह आस्था का विषय है वहीँ दूसरी ओर वह हिन्दू समुदाय से भी अपील कर रहे हैं कि हर जगह शिवलिंग खोजकर देश का माहौल न खराब करें, यहाँ वह आरएसएस की कट्टर छवि को भी थोड़ा नरम करके पेश कर रहे हैं. 

संघ प्रमुख को मालूम है कि सरकार के दावे कुछ भी हों देश आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, मंहगाई चरम पर है, बेरोज़गारी सर्वकालिक ऊंचाई पर है और सरकार चाहकर भी कुछ ठोस कदम नहीं उठा पा रही है ऐसे में जब पूरे देश की मस्जिदों शिवलिंगों की तलाश होने लगेगी तो साम्प्रदायिक सद्भाव जो टूटा हुआ है और बिखरेगा, देश में अराजकता फैलेगी जो यकीनन सरकार के लिए सिरदर्द बनेगी। संघ प्रमुख को मालूम है कि सिर्फ ज्ञानवापी मस्जिद और शाही ईदगाह का मामला ही भाजपा सरकार के वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए काफी है तो फिर दूसरे गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा?

अब अगर बात करें आरएसएस ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर आंदोलन नहीं करेगी वाले बयान पर तो संघ कभी भी ऐसे मामलों में सीधे तौर पर सामने नहीं आता है. अयोध्या मामले में भी नहीं। अयोध्या मामले में विहिप आंदोलन कर रही थी जिसका बाद में राजनीतिकरण हुआ और भाजपा ने उसे अपना लिया। अडवाणी जी ने रथयात्रा निकाली, मस्जिद का विध्वंस हुआ तो शिवसेना ने श्रेय लिया। इसलिए भागवत जी की इस बात के कोई अर्थ नहीं निकलते हैं कि संघ किसी आंदोलन में हिस्सा नहीं लेगा। भागवत जी को मालूम है कि मुद्दा बनने के बाद उसे आगे बढ़ाने वाले अब बहुत से दक्षिणपंथी संगठन बन चुके हैं और यह दिख रहा है. संघ प्रमुख के बयान के बावजूद कर्नाटक के मांड्या की जामा मस्जिद के बाहर सैकड़ों की संख्या में बजरंग दल और विहिप के कार्यकर्ता जुटे हुए हैं और हनुमान चालीसा पढ़ने की ज़िद पर अड़े हैं. वैसे तो लगभग सभी हिन्दू संगठन संघ प्रमुख की बातों को आदेश समझते हैं लेकिन देखा जा रहा है कि इस बार वह बचते हुए नज़र आ रहे हैं. ऐसा क्यों यह एक बड़ा सवाल है. 

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वहीँ मोहन भागवत के इस बयान पर ओवैसी जैसे मुस्लिम दक्षिणपंथी अलग राग अलाप रहे हैं, वह संघ प्रमुख के बयान को हाथी के दांत बता रहे हैं, वह मोहन भागवत के आंदोलन न करने की बात पर भी सवाल उठा रहे हैं और कह रहे है कि बाबरी मस्जिद मामले में भी यही कहा था. ओवैसी जैसे और भी हैं जो उकसाने की भाषा बोलते हैं और मुस्लिम नौजवान उस उकसावे में आ भी जाते हैं, कानपूर में क्या हुआ, यही सब तो हुआ, अब गिरफ्तारियां हो रही हैं. राजनीती भी होगी और रोटियां भी सेंकी जाएँगी। 

बहरहाल हमारा तो मानना यही है कि आपसी समझौते से वाराणसी और मथुरा के मुद्दे हल हो जाते हैं और बाक़ी का शोर शराबा जो पूरे देश में फैला हुआ अगर बंद हो जाय तो इससे अच्छी कोई बात नहीं।

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