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मोदी सरकार को लगा झटका, SC ने इलेक्टोरल बांड पर लगाई रोक

electoral bond

इलेक्टोरल बॉन्ड यानि चुनावी चंदा हमेशा विवाद का मुद्दा रहा है विशेषकर मोदी सरकार के आने के बाद, क्योंकि अब इसके बारे में जनता को कोई जानकारी नहीं मिल सकती कि किसने कितना चंदा दिया है। इसका नतीजा ये हुआ है कि भाजपा को छोड़कर चुनावी चंदे के रूप में देश की दूसरी पार्टियां गरीब होती जा रही हैं. ADR की रिपोर्ट के मुताबिक 80 प्रतिशत चुनावी चंदा भाजपा को मिल रहा है वहीं 20 प्रतिशत में देश की शेष पार्टियां हैं, यही वजह है कि भाजपा विश्व की सबसे मालदार पार्टी बन चुकी है लेकिन अब देश शीर्ष अदालत ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक माना है और सुप्रीम कोर्ट में ये फैसला सर्वसम्मत से आया है.

सीजेआई चंद्रचूड़ ने आज फैसला सुनाते हुए कहा कि फैसले में दो मत हैं लेकिन निष्कर्ष एक ही है. शीर्ष अदालत ने माना कि चुनावी बांड स्कीम सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19(1)(ए) का सीधा उल्लंघन है. राजनीतिक दलों की फंडिंग के बारे में जनता को जानने का पूरा अधिकार है. बता दें कि मोदी सरकार साल 2017 में ये कानून लेकर आई थी. सुप्रीम कोर्ट का चुनावी बॉन्ड को रद्द करने का फैसला मोदी सरकार को बड़ा झटका माना जा रहा है.

सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा है कि क्या 19(1) के तहत सूचना के अधिकार में पोलिटिकल फंडिंग के बारे में जानने का अधिकार शामिल है? शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि इस अदालत ने राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मुद्दों के बारे में जानकारी के अधिकार को मान्यता दी और यह केवल राज्य के मामलों तक ही सीमित नहीं है बल्कि लोकतंत्र सिद्धांत को आगे बढ़ाने तक जाता है.

सीजेआई ने कहा कि हमारे सामने ये सवाल था कि क्या आरटीआई के तहत राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग भी आएगी? उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह जानने का नागरिकों को अधिकार है कि सरकार के पास पैसा कहां से आता है और कहां जाता है. बता दें मोदी सरकार द्वारा 2017 में इलेक्टोरल बांड को लेकर नियमों में जो बदलाव किये थे, विपक्ष ने उसे भ्रष्टाचार का नया जरिया और स्कैम बताया था. शीर्ष अदालत ने कहा है कि चुनावी बॉन्ड से काले धन को सफ़ेद किया जा रहा है. अदालत ने 31 मार्च 2024 तक की जानकारी साझा करने का सरकार को आदेश दिया है.

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