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नए प्रयोग की तैयारी में मायावती

mayawati

अमित बिश्नोई

लोकसभा चुनाव सिर पर आ गए हैं, पार्टी सुप्रीमो मायावती पहले ही एकला चलो का एलान कर चुकी हैं। कैसे चलेंगी ये तो वही जानें फिलहाल तो पार्टी में विधायकों, सांसदों और नेताओं का चलचलाव जारी है, एक एक करके कई नेता हाथी से उतरकर सत्ता के साथ या विपक्ष यानि सपा के साथ जा चुके हैं और कुछ जाने की तैयारी में हैं, वैसे विपक्ष में तो बसपा भी है फिर भी पता नहीं क्यों राजनीति में उसे भाजपा की बी टीम कहा जाता है. बहनजी को बुरा भी लगता है लेकिन जब घटनाक्रम सामने दिखता है तो लोगों की ज़बान कोई बंद तो नहीं कर सकता। अब आप ही कहिये कि बहन जी के जांनशीन को सरकार की तरफ से वाई प्लस सुरक्षा मिल गयी. अभी उनका राजनीतिक जीवन ही कितना हुआ है कि उनके दुश्मन पैदा हो गए और अभी इतना लोकप्रिय भी नहीं हुए कि उन्हें कोई रास्ते से हटाने की कोशिश करे. अब ऐसे में सत्ता की तरफ से सुरक्षा का तोहफा मिलेगा तो कुछ तो लोग कहेंगे ही क्योंकि लोगों का काम ही है कहना।

बसपा में नेताओं की मची भगदड़ से शायद बहन जी को इतनी परेशानी नहीं है लेकिन दिक्कत ये है नेताओं के जाने से समर्थकों के भी जाने का खतरा है और एक सन्देश भी वोटर्स में जा रहा है कि मायावती तो गयी. बात काफी हद तक सही है. मायावती यानि बसपा तो 2019 के चुनाव में ही ख़त्म हो जाती अगर भतीजा बुआ की मदद को न आता. बुआ को तो एहसान मानना चाहिए कि भतीजे की मदद से सांसदों की संख्या 10 तक पहुँच गयी ये अलग बात है कि 24 तक आते आते उनकी संख्या काफी कम हो गयी.

इसी भगदड़ को रोकने और उससे ज़्यादा वोटर को रोकने के लिए बहन जी एक नया प्रयोग करने जा रही हैं। इस बार वो उन लोगों को चुनाव लड़ाने जा रही हैं जो अबतक पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव लड़वाते थे यानि पार्टी के कोऑर्डिनेटर? जो जानकारी बहन जी के महल से निकलकर आ रही वो तो यही है कि पार्टी सुप्रीमो ने बचे हुए पुरानों के भी टिकट काटने का फैसला किया है और एक नई टीम को चुनावी मैदान में उतारने जा रही हैं. बहनजी का मानना है कि कोऑर्डिनेटरों पर ज़्यादा भरोसा किया जा सकता है. दूसरे आम नेताओं से ये कोऑर्डिनेटर क्षेत्र के लोगों और पार्टी के वोट बैंक से भी ज़्यादा नजदीकी से जुड़े रहते हैं. हर चुनाव में उम्मीदवार से ज़्यादा यही कोऑर्डिनेटर समर्थकों और वोटर्स को एकजुट रखते हैं तो इन्हीं लोगों को क्यों न चुनाव में उतारा जाय. ये वोटर्स और समर्थकों के साथ सांसदों, विधायकों को भी बिखरने से रोक सकते हैं. मायावती का ये एक नया तजुर्बा होगा, वैसे मायावती चुनावी तजुर्बे करती रहती हैं। दूसरे उनके पास ज़्यादा विकल्प भी नहीं। भरोसा तोड़ने वाले तो भरोसा तोड़कर भाग रहे हैं इसलिए वफादारों को ही क्यों न आज़माया जाय.

इन कोऑर्डिनेटर्स के पास चुनाव लड़ाने का बरसों पुराना तजुर्बा भी है और चुनाव जीतने के लिए तजुर्बा भी काफी अहमियत रखता है. कहा जा रहा है कि मेरठ और आगरा मंडल के कोऑर्डिनेटर मुनकाद अली को तैयारी के लिए कह दिया गया है, इसी तरह लखनऊ और कानपुर मंडल के कोऑर्डिनेटर नौशाद अली को कन्नौज से उतारने की तैयारी की जा रही है. झांसी और चित्रकूट मंडल के कोऑर्डिनेटर लालाराम अहिरवार को जालौन से उतारने का फैसला किया गया है. आंबेडकर नगर, लालगंज, बिजनौर और नगीना की सीट पर भी किसी कोऑर्डिनेटर को ही प्रत्याशी बनाने की तैयारी हो रही है. अब जब अकेले चुनाव लड़ना है तो कुछ न कुछ अलग करना ही पड़ेगा। जल्द ही मायावती 45 सीटों के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने वाली हैं, देखना होगा कि उस लिस्ट में कितने कोऑर्डिनेटर्स को जगह मिलती है.

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