तांत की साड़ी, कंधे पर थैला, पैरों में हवाई चप्पल है ममता दीदी की पहचान
सुनील शर्मा
न्यूज डेस्क। तांत की साड़ी पहने, कंधे पर थैला लटकाये पैरों में हवाई चप्पल पहन कर चलने वाले ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री होने के बावजूद सादगी की मिसाल हैं। अपने प्रशंसकों के बीच दीदी कहलाने वाली ममता बनर्जी आज भी जब मंच से गरजती हैं तो समझ आ जाता है कि क्योें उन्हें बंगाल की शेरनी कहा जाता है। ममता बनर्जी का जीवन संघर्षों से जुड़ा रहा और उन्होंने हर मुश्किल का सामना बखूबी किया। सन 2011 पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने वाली ममता बनर्जी ने वाम दलों को पराजित कर सत्ता सिंहासन पर कब्जा किया और उनका राज आज भी कायम है। पश्चिम बंगाल में उनका प्रभाव इतना अधिक है कि वहां होने वाले विधानसभा चुनाव में ममता का सामना करने के लिये पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह खुद चुनावी मैदान में उतर आये हैं। बचपन में परिवार को पालने के लिये दूध बेचने वाली ममता बनर्जी का मुख्यमंत्री बनने तक का सफर आसान नहीं रहा। आईये जानते हैं ममता बनर्जी के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में….
बेहद कम उम्र में रखा था राजनीति में कदम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार ममता बनर्जी का जन्म कोलकाता में एक हिंदू बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रोमिलेश्वर बनर्जी था और मां का नाम गायत्री देवी था। मात्र 9 साल की उम्र में जब ममता बनर्जी के पिता का देहांत हुआ था तो उनके परिवार को बेहद गरीबी का सामना करना पड़ा। मगर बचपन से ही साहसी ममता ने अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण में अपनी विधवा मां की मदद करने के लिये दूध बेचना शुरू कर दिया। छोटी उम्र में ही सामने आये मुश्किल हालातों ने ममता को और अधिक मजबूत बना दिया।
15 साल की उम्र में ही राजनीति में उतर आईं ममता ने जोगमाया देवी काॅलेज में छात्र परिषद यूनियन की स्थापना की जो कांग्रेस (आई) की स्टूडेंट विंग थी। इसने वाम दलों की आॅल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन को हराकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में होने वाले परिवर्तन का अहसास करा दिया था। अपने लक्ष्य से न भटकने का संकल्प मन में लिये ममता बनर्जी ने अविवाहित रहकर अपना जीवन जनता को समर्पित कर दिया।
1976 में ममता को महिला कांग्रेस की महासचिव चुना गया। उनकी बढ़ती लोकप्रियता को देख कांग्रेेस पार्टी ने 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में जाधवपुर सीट से चुनाव लड़ रहे सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी के समक्ष ममता को मैदान में उतारने का निर्णय लिया। उस समय सोमनाथ चटर्जी को हरा पाना नामुमकिन माना जाता था। मगर अपनी वाकपटुता और लोगों के अन्र्तमन पर छा जाने की कला के जरिये ममता बनर्जी ने जीत हासिल करने का करिश्मा कर सभी को अपने लंबे राजनीतिक सफर तय करने का अहसास करा दिया था। उस समय की सबसे युवा सांसद बनी ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस के नाम से उन्होंने नई पार्टी बनाई और उसकी अध्यक्ष बनकर साल 2011 में वाम दलों की दशकों पुरानी सत्ता को धाराशायी कर दिया। वर्तमान में भी ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पद पर काबिज हैं।
सादगी की मूर्ति ममता के भीतर बसा है कलाकार
आमतौर पर नीले बाॅर्डर की सफेद काटन की साड़ी और हवाई चप्पल पहनने वाली और कभी कंधे पर झोला टांग कर नजर आने वाली ममता बनर्जी का जीवन सादगी की मिसाल है। शायद ही कभी किसी ने ममता बनर्जी को जेवरात या महंगे कपड़े पहने देखा हो। ममता बनर्जी के दक्षिण कोलकाता के हरीश चटर्जी स्ट्रीट पर स्थित उनके पैतृक निवास में आज भी भारी बारिश के दौरान पानी भर जाता है। ममता बनर्जी जब रेल मंत्री थीं तो उनके घर आये पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उनकी सादगी देखकर दंग रह गए थे।
ममता बनर्जी की पहचान एक लेखक और पेंटर के रूप में भी है। ममता बनर्जी ने बांग्ला भाषा में 32 और अंग्रेजी भाषा में 5 किताबें लिखीं हैं। कविताएं लिखने का शौक रखने वाली ममता बनर्जी की 300 पेंटिंग्स भी बिक चुकी हैं जिनकी कीमत 5 करोड़़ रुपये थी। कम ही लोगों को पता है कि चेहरे से कठोर दिखने वाली मुख्यमंत्री के भीतर एक कलाकार बसा है।
अपनी ही सरकार का भी किया विरोध
ममता बनर्जी की छवि एक आक्रामक राजनेता कि है जो अनेक बार अपनी ही पार्टी या गठबंधन के नेतृत्व पर सवाल उठाने में भी पीछे नहीं रहीं। नरसिम्हा राव सरकार में ममता को मानव संसाधन, युवा कल्याण, खेलकूद और महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री बनाया गया। बतौर मंत्री उन्होंने कई बार अपनी ही सरकार के फैसलों का विरोध किया। साल 1999 में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल ममता बनर्जी को केंद्रीय रेल मंत्री बनाया गया। लेकिन गठबंधन के खिलाफ आवाज उठाने वाली ममता ने 2001 में एक विवाद के बाद राजग सरकार से नाता तोड़ लिया। हालांकि 2004 में एक बार फिर वह गठबंधन में शामिल हुईं और कोयला और खनन मंत्रालय का पद संभाला। सन 2005 में सिंगूर और नंदीग्राम में किसानों की जमीन के अधिग्रहण का ममता बनर्जी ने पुरजोर विरोध किया। इसके चलते जनता के बीच उनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी। 2011 में पश्चिम बंगाल के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 184 सीटों पर जीत हासिल की और ममता बनर्जी ने राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
आज भी मंच से दहाड़ती ममता बनर्जी विपक्षी खेमे मेें हलचल पैदा कर देती हैं। चेहरे पर कठोरता लिये ममता बनर्जी अपनी जनता के लिये कभी भी और किसी का भी सामना करने को तैयार रहती हैं। दूध बेचने से लेकर मुख्यमंत्री पद तक का सफर तय करने के दौरान अपने दम पर हर लड़ाई लड़ने वाली ममता महिलाओं को प्रत्येक संघर्ष का सामना करने का हौसला देती हैं। राजनीति से इतर ममता का जीवन संघर्ष और मुश्किल हालात का सामना करने का हौसला किसी के लिये भी प्र्रेरणा का स्रोत है।
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