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The Kashmir Files जैसी फिल्म बनाना वाकई हिम्मत का काम है- अतुल श्रीवास्तव


The Kashmir Files जैसी फिल्म बनाना वाकई हिम्मत का काम है- अतुल श्रीवास्तव

Zeba Hasan

फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में एक कैमियो किरदार था। संजय दत्त के नकली अस्पताल में नकली दिल के मरीज का। इस कैमियो को निभाया था अतुल श्रीवास्तव (Atul Srivastava) ने। अपने फिल्मी करियर की शुरुआत में इस रोल को पहले ना कहने वाले अतुल को खुद नहीं मालूम था कि इतना छोटा सा स्क्रीन एपिएरेंस उनके लिए पहचान बन जाएगा। भले ही अतुल श्रीवास्तव को नाम से लोग एक दम से ना पहचाने लेकिन उनका चेहरा देखते ही लोग उनके किरदारों को याद करते हैं। बंजरंगी भाईजान, टायलेट एक प्रेम कथा, बत्ती गुल मीटर चालू, लुका छिपी या फिर स्त्री जैसी फिल्मों में अतुल ने प्रॉमिनेंट रोल किए हैं। शुक्रवार को रिलीज हुई कशमीर फाइल्स (Kashmir Files ) में एक पत्रकार के किरदार में फिर से उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। इस फिल्म से जुड़े सवालों के जवाब दे रहे हैं अतुल श्रीवास्तव।


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विषणु राम ब्यूरो चीफ ऑफ कश्मीर इस किरदार के लिए कोई होमवर्क किया था?

यह फिल्म एक सच्ची घटना पर बनाई गई है। जहां तक मेरे किरदार का सवाल है तो उस दौर में एक पत्रकार की भूमिका क्या रही होगी इसपर चिंतन मनन जरूर किया है। कोई खास तैयारी तो नहीं की। डायॅलग पर मुझे काम करना नहीं था मेरी भाषा हिंदी ही थी। हां मैंने बहुत सारे विडियो देखे जो रियल थे। उन विडियोज को देखकर मैंने अपने किरदार के बारे में बहुत सारा मंथन किया। विषणु राम दुविधा में रहने वाला किरदार है। वह डरा हुआ है जो करता है मजबूरी में करता है। मेरा डायलॉग है फिल्म में कि एक साथ ‘उन्नीस पत्रकारों को मार दिया क्या किसी ने प्रोटेक्ट किया हमें’ यह अपनी जान बचाने के लिए परिस्थियों के साथ अपनी नौकरी को अंजाम देता है।


जब आपके पास यह किरदार आया तो क्या रिएक्शन था?

मैंने जब इस कहानी को पढ़ा तो मुझे लग गया था कि यह सबजेक्ट अुनछुआ है जिसे लोग जरूर देखना चाहेंगे। मैंने सोचने के लिए वक्त नहीं लिया था कहानी पूरी पढ़ते ही रोल के लिए हां कर दी थी। यह किरदार मेरी दूसरे किरदारों से अलग है। और मुझे खुशी है कि मैं इस फिल्म का हिस्सा बना। वाकई इस तरह की फिल्म बनाना हिम्मत का काम है। विवेक जी ने रिर्सच और ग्राउंड वर्क के बाद इस फिल्म का खाका तैयार किया है। पूरी दुनिया से 700 लोगों से इंटरव्यू किया है विवेक जी ने। 25 जगह स्पेशल स्क्रीनिंग भी की है फिल्म की। हर तबके के लोग इसे देखना चाह रहे थे। खुशी इस बात की है इसे लोग एक दूसरे से इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैं। और इसे देखने की अपील भी।


कभी अस्ल जिन्दगी में पुष्करनाथ जैसे किसी इंसान से मुलाकात हुई?

बिलकुल हुई। मैं तो खुद को भी पुष्करनाथ के करीब ही मानता हू जो एक सीधा साधा इंसान है। किसी छलकपट से दूर सादा जिंदगी जीने वाला। वह नब्बे का दशक था जब मेरा जाना मनकापुर हुआ था। वहां मुझे बहुत सारे ऐसे लोग मिले थे जिन्होंने अपने दर्द को मेरे साथ शेयर किया था। यहां तक नौजवान बच्चे भी अपनी कहानियां सुना रहे थे। फिल्म की शूटिंग के वक्त कशमीर में ऐसे कई लोगों से मुलाकात हुई। तो फिल्म में जो भी दिखाया है वह कतई कालपनिक नहीं है। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे दुनिया के समाने आने ही नहीं दिया गया।


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क्या यह फिल्म उन लोगों को इंसाफ दिलाएगी जो इस दर्द से गुजरे हैं?

इनसाफ के बारे में तो मैं नहीं जानता लेकिन इस फिल्म ने उन्हें संतावना जरूर दी है। फिल्म की स्क्रीनिंग पर कशमीरी पंडितों (Kashmiri Pandits) को भी बुलाकर फिल्म दिखाई गई है। जहां भी प्रीमियर हुआ वहां फिल्म देखने आए लोग अपने आंसू नहीं रोक पाए। हैदराबाद में तो एक महिला ने हमारे डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री के पांव तक पकड़ लिए थे। उनका यही कहना था कि कम से कम हमारी तकलीफों पर बात तो की गई। आजतक जिस मुद्दे को दबाया गया उसे पर्दे पर लाकर हमारे लिए मरहम का काम किया है। हमें इतने में ही संतुष्टी है। मैं भी इस बात से इत्तेफाक रखता हूं कि ऐसे लोग जिन्होंने अपने खिलाफ हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिए बंदूक नहीं उठाई बल्कि चुपचाप अपने घरों को छोड़ कर एक अलग दुनिया बसा ली उनकी तकलीफों से दुनिया भी रूबरू होगी।

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