आस्था ही नहीं सौहार्द का भी प्रतीक है मेरठ का काली माई मंदिर
पारुल सिंघल
आस्था जहां विश्वास को मजबूत बनाती है वहीं लोगों के प्रति प्रेम और दया का भाव भी सिखाती है। हिंदू, मुस्लिम, सिख हो चाहे ईसाई, हर धर्म में एक दूसरे के प्रति मन में सौहार्द और आदर सिखाता है। इसका जीता जागता उदाहरण उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में देखने को मिलता है। हां सदर इलाके में एक साथ मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारे स्थित है। जहां एक तरफ गुरु की बानी होती है तो दूसरी तरफ अजान और बीच में घंटियों संग माँ की आरती होती है। भक्ति और सौहार्द का ऐसा अनूठा संगम विरले ही देखने को मिलता है। यहाँ ये तीनों त्रिकोण में स्थापित हैं।
250 साल पुराना हैं माँ काली का मंदिर
एकता की मिसाल को कायम करते हुए इस जगह पर सभी धर्मों के लोग आते जाते हैं। यहां बना मां काली का मंदिर ढाई सौ साल से भी अधिक पुराना है। इस मंदिर को लेकर भक्तों में अटूट विश्वास और श्रद्धा है। इसका नजारा हर मंगलवार और शनिवार को देखने को मिलता है। वही नवरात्रों में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। माना जाता है कि देवी काली यहां स्वयं विराजमान है। नवरात्रों में सप्तमी, अष्टमी को यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। वही होली, दीवाली और अमावस्या से पहले चौदस के दिन विशेष पूजा का भी आयोजन होता है।
एक ऐसा मंदिर जहां माँ काली आती हैं स्वयं आरती लेने
170 साल से हो रही है अजान
मां काली के मंदिर के एक तरफ यहाँ सौदागरान मस्ज़िद स्थित है। मुस्लिम धर्म की आस्था का केंद्र ये मस्ज़िद 170 साल से भी अधिक पुरानी है। इस मस्जिद की खासियत इसकी नक्काशी है। यहां आकर लोग इस इसकी नक्काशी की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते हैं। रोजों में यहां रोजेदारों की खास भीड़ उमड़ती है। शहर के मुख्य बाजार और पुराने इलाके में स्थित इस मस्जिद का निर्माण 1257 हिजरी में हुआ था।
सालों से सेवा में लगा है गुरुद्वारा
आस्था और भाईचारे ये प्रतीक इस स्थान पर जहां सुबह शाम मंदिर की घंटियां और अज़ान सुनाई देती है वहीं कुछ कदम की दूरी पर बना गुरुद्वारा बना हुआ है। इस गुरुद्वारे का निर्माण भी काफी साल पहले हुआ था। यहां लंगर के साथ ही लोगों के लिए इलाज़ की व्यवस्था भी है। मन्दिर मस्जिद और गुरुद्वारे तीनों के बीच चंद कदमों की दूरी है बावजूद इसके यहां सभी धर्मों के लोग एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हैं

