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पुरानी चमक बटोरने की जुगत में है लखनवी चिकन उद्योग


पुरानी चमक बटोरने की जुगत में है लखनवी चिकन उद्योग

रंजीता सिन्हा

लखनऊ। नवाबों की नगरी लखनऊ के चौक चौराहे के पास ही विश्व प्रसिद्ध टुंडे कबाब की दुकान है। बस इसी दुकान को जाने वाला एक संकरा रास्ता लखनवी चिकनकारी की उस दुनिया में पहुंचा देता है जिसकी कारीगरी की पहचान पूरी दुनिया में है। लखनऊ का चिकन उद्योग इसी छोटी सी दुनिया से निकल कर विश्व प्रसिद्ध बना हुआ है। लखनऊ में मौजूद पांच हजार चिकनकारी की दुकानों में से पचास प्रतिशत इसी सड़क के किनारे हैं। गोल दरवाजे से इस सड़क पर आगे जाने पर यह अनुमान लग जाता है कि कोरोना काल ने चिकन व्यवसाय को कितनी चोट पहुंचाई। कुलमिलाकर कोरोना के हालात सामान्य होने पर लखनवी चिकन उद्योग अपनी पुरानी चमक हासिल करने की जुगत में है।

ताजा हालात यह है कि, यहां ट्रैफिक और लोगों की आवाजाही तो है लेकिन चिकन की दुकानों पर पहली जैसी रौनक अभी नहीं लौटी। ठंडी पड़ी दुकानों के कारीगर और मालिक एक नये सिरे से खुद में उत्साह भर रहे हैं। यहीं कुछ दूरी पर खत्री मार्केट में नीचे की ओर चिकन के वस्त्रों से सजी दुकान बनारसी दास एंड संस है। शॉप ओनर आशु महेंद्र बीते तीस सालो से चिकन के व्यवसाय में है। कोरोना काल से पहले यह शॉप खरीददारों से भरी रहती थी, अब लॉकडाऊन् खुलने और कोरोना का संक्रमण कम होने की वजह से खरीददार लौटें तो है पर बड़ा बिजनेस नहीं हो रहा। आशु रोजना सुबह से अपने कर्मचारियों के साथ आम ग्राहकों के साथ-साथ किसी बड़ी डील की उम्मीद लिए दिन काट रहे हैं। ऐसे में अगर कोरोना की तीसरी लहर हावी हुई तो सारी कवायद और उत्साह फिर से धरा का धरा रह जाएगा।

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आशु के मुताबिक, चिकन कपड़ों के सबसे बड़े खरीददार बाहर से लखनऊ आने वाले टूरिस्ट होते हैं। बीते मार्च माह में कोरोना संक्रमण बढऩे के बाद लॉकडाउन लगा और व्यवसाय ठप पड़ गया। इस बीच लखनऊ की प्राचीन इमारतें न खुलने से टूरिस्ट नहीं आए। इससे चिकन का पूरा बिजनेस भी रुक गया। पहले चिकन बिजनेस से इनकी शॉप का का बिजनेस एक करोड़ रुपए वार्षिक था। फेस्टिवल और वेकेशंस के चलते हर साल फरवरी महीने से लेकर जुलाई माह तक का समय चिकन व्यवसाय का गोल्डन पीरियड होता था।

गौर हो कि चिकन कपड़ों के कारोबारी अपनी आमदनी का 70 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं दिनों में हासिल कर लेते थे। इस बार गुजरे छह महीनों में कोरोना की आफत से चिकन व्यवसायियों की कमर टूट गई। खास शॉप का भी बीते दिनों तक बिजनेस 10 लाख रु. का भी न हो सका था। स्थिति सामान्य होने तक पिछली सेविंग्स से ही दुकान मेनटेंनेंस और कर्मचारियों के खर्चे सभी व्यवसाईयों को पूरे करने पड़े। बहरहाल अगर ऐसे हालात आगे भी बने तो बड़ी संख्या में चिकन बिजनेसमैन दूसरा कोई व्यवसाय पकडऩे को मजबूर हो जाएंगे।

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हालात अब भी ठीक नहीं कहे जा सकते। कोविड काल के कारण लखनऊ में चिकन व्यवसाय से जुड़े पांच लाख व्यवसायी और कारीगर अब भी आर्थिक संकट में हैं। महामारी के अंदेशों के बीच 2,000 करोड़ रुपये की होने वाली रोजाना लेनदेने पर अंकुश लग जाने से पूरे कारोबार की जान सांसत में है। लखनऊ चिकन हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के कारोबारी टंडन भी कुछ ऐसा ही दर्द-ए-बयां करते हैं। कहते है कि, लॉकडाऊन पूरी तरह खुलने के बाद पिछले ऑर्डर का जो तैयार आइटेम है उसके ही भुगतान को निकालने की जुगत चल रही है। ऐसे में सामान्य स्थिति के रहते अगले साल भी चिकन कारोबार ठंडा ही रहने की आशंका है।

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