Zeba Hasan
पारचे वाली गली, टकसाल वाली गली, फूलों वाली गली, मेवे वाली गली, घड़ियाल वाली गली, चावल वाली गली, रोटी वाली गली….चौक की एक गली की यह वो गलियां हैं जो अपने नाम की तरह खास और मशहूर हैं। इन गलियों की शान ही कभी अलग हुआ करती थी, लेकिन आज गंदगी, टूटी सडक़ और जाम से जूझ रही हैं। लखनऊ पर लिखी गई किताबें हों या फिर शायरों की जुबान वहां भी इन गलियों का जिक्र होता है, लेकिन बदलते हुए दौर और लोगों की नजरअंदाजी ने इन गलियों की सूरत को काफी हद तक बदल दिया है।
Read also: काकोरी में बसा दशहरी आम का ‘आदम’
जिंदगी की जरूरत का हर सामान
किसी शायर ने लिखा है कि इस शहर कि गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं…लेकिन लखनऊ जैसे जैसे बढ़ता गया लोगों ने लखनऊ को नये और पुराने में बांट दिया। नया लखनऊ तो चमक रहा है, लेकिन जिस तरह पुराने समान को लोग नजरअंदाज कर देते हैं उसी तरह पुराने लखनऊ जो इस शहर के कल्चर की पहचान है उसे ही भुला दिया है। 1965 से चिकन के कपड़ों का बिजनेस कर रहे वसीम अली कहते हैं कि यह वो चौक हैं जहां जिन्दगी की जरुरत का हर समान सिमटा हुआ है। लेकिन अब गंदगी ने हर किसी को परेशान कर दिया है।
यहां क्या नहीं मिलता
मेहंदी, सुरमा, चोटी, लचका गोटा, गरारा, शरारा, ज्वेलरी, चिकन, कबाब, शीरमाल, इत्र, तम्बाकू, हुक्का, कपड़े जूते, चश्मा, घड़ी, मिठाई, पूराने सिक्के, एंटीक का समान, नगीने, धार्मिक सामान, यानी इस चौक में जिन्दगी से लेकर मौत के बाद भी इस्तेमाल होने वाला सामान मिलता है। पिछले 60 साल से चिकन टोपियां और कुर्ते की दुकान चला रहे मोहम्मद नासिर कहते यहां कभी नीचे मार्केट और ऊपर तवायफों का ठिकाना हुआ करता था। इत्र की फैक्ट्री थी जहां से दुनिया भर में इत्र सप्लाई किया जाता था। अब वो रौनक रही नहीं। भीड़ और बिक्री भले ही पहले से बढ़ गई है, लेकिन उसके साथ साधान और उपाय नहीं बढ़ें हैं। नालियां भरी हुई हैं। बरसात में सडक़ के गड्ढों में पानी भर जाता है लोगों का चलना भी दूभर हो जाता है। दुकानों के आगे खड़ी होने वाली गाड़ियां कई बार ऐसा जाम लगा देती हैं कि लोग घंटो इसमें फंसे रहते हैं।
रोज नहीं होती सफाई
मेवे वाली गली के बाहर पान की गुमटी लगाने वाले सगीर अहमद कहते हैं कि कभी अंग्रेजों के वक्त में यहां से मेवे जाते थे तभी से इसका नाम मेवे वाली गली हो गया है। सालों हो गये इसकी बुरी हालत है, कितनी बार शिकायत की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। वहीं फूलों वाली गली जहां से पूरे शहर में फूल सप्लाई होते थे बरसात आते ही लोग परेशान हो जाते हैं। वसीम कहते हैं कि कभी टोपियों के पल्ले यहां बनते थे। उन टुकड़ों को पारचे कहा जाता था नवाबी दौर में यह टोपियां बहुत खास हुआ करती थीं। इन टोपियों की वजह से ही चौक की एक गली का नाम पारचे वाली गली भी पड़ गया था।
Read also: शहर का पूरा अहमद परिवार संभाल रहा है डॉग्स ट्रेनिंग का पुश्तैनी काम
यह गलियां हैं खास
सोने के सिक्कों की ढलाई जिस गली में होती थी वो टक्साल वाली गली के नाम से जानी जाती है। अब कोई टक्साल तो नहीं यहां चांदी के वर्क वाले काम करते हैं, लेकिन इसे आज भी टक्साल वाली गली के नाम से ही जाना जाता है। घडिय़ाली वाली गली जहां सोने चांदी के कारीगर काम करते हैं आज भी यहां यही काम होता है। वहीं रोटी वाली गली में कदम रखते ही भूख का अहसास भी जाग जाता है। आटे की महक से अहसास हो जाता है कि यही रोटी वाली गली है। इस गली को चावल वाली गली भी कहा जाता है। लेकिन इस गली में जिधर देखो कहीं तवे पर तो कहीं तंदूर पर बस रोटियों के कारीगर अपने हुनर को सेकते नजर आते हैं। रुमाली रोटी, खमीरी रोटी, नान रोटी, शीरमाल, गाऊजबान, धनिए वाली रोटी, मेवे वाली रोटी, जैसे चाहिए वैसी रोटी यहां मिल जाएगी। इस गली का भी बुरा हाल है। बड़ बड़े गड्ढे हैं जिनमे पानी भर जाता है और कई बार लोग गिरते गिरते बचते हैं। मोहम्मद खालिद कहते हैं कि अभी चुनाव के दौरान सभी हमसे वोट की अपील करने के लिए आए, लेकिन काम करवाने के लिए कोई नहीं आता। हर बार हम लोग यही सोचते हैं कि इस बार शायद हमारा वोट हमारे काम आ जाए, लेकिन हर बात की तरह इस बार भी कोई सुनवाई कहीं नहीं हो रही है।
