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प्रणय सन्देश ‘पद’ और ‘पदनाम’ मानों “वेलेंटाइन” हों, उनके लिए….!


प्रणय सन्देश ‘पद’ और ‘पदनाम’ मानों “वेलेंटाइन” हों, उनके लिए….!

(निरुक्त भार्गव)

हमारे देश में लोग काम-वाम करें ना करें, पर उन्हें “पदनाम” से बहुत लगाव होता है! सरकारी नौकरियों में तो हालात और भी कमाल के रहते हैं! सरकार चलाने वाले राजनीतिज्ञ किसी योजना या कार्यक्रम अथवा किसी गतिविधि के लिए फंड मुहैया कराने में जितनी कंजूसी करते हैं, इसके ठीक उलट वे उतनी-ही दयालुता अपने कर्मचारियों को ‘उच्च’ पदनाम स्वीकृत करने में प्रदर्शित करते हैं! प्रायवेट सेक्टर भी इस चूहा दौड़ में अब पीछे नहीं है: वो काम के बदले वेतन भले ही चवन्नी भर दे, लेकिन आकर्षक और ऊंचे पदनाम देकर अपने कर्मचारियों का तुष्टिकरण जरूर करता रहता है! आखिर पदनामों के साथ इतना ‘मीठा’ क्या होता है…..

पहले सरकारी क्षेत्र की बात कर लेते हैं. यहां आईएएस/आईपीएस/आईएफएस/आईआरएस जैसे संघीय वर्ग में बैच और कैडर की मारामारी पूरे सेवाकाल में चलती है! इन सेवाओं के अनेक जीव तो रिटायर होने के बाद भी पदनाम से चिपके रहना चाहते हैं और अपने विसीटिंग कार्ड और लेटर पैड में भी ‘पूर्व’ या ‘सेवानिवृत्त’ शब्द जोड़े बिना ‘प्रदत्त’ पदनाम का इस्तेमाल करते हैं, हिकमत अमली से! और तो और, इस तरह के महाशय अपने घर की नाम पट्टिका में भी ठप्पे से रुतबेदार बने रहते हैं!

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‘प्रोफेसर’ और ‘डॉक्टर’ नाम का तो क्रेज़ ही निराला है! स्थितियां इतनी बेकाबू हैं कि रिटायर होने के बाद भी प्रोफेसर शब्द से मोह खत्म नहीं होता! प्राइवेट कॉलेज के पार्ट-टाईम सहायक प्राध्यापक भले ही नॉमिनल पारिश्रमिक पर काम कर लेंगे, किंतु प्रबंधन द्वारा प्रोफेसर का संबोधन देने पर फूले नहीं समाते! मजे की बात ये भी है कि कॉलेज के कतिपय प्राध्यापक पीएचडी नहीं कर पाते तो खुद को प्रोफेसर लिखने लगते हैं। प्रोफेसर का मतलब होता है “आचार्य” और कॉलेज की सेवाओं में अधिकतम ‘वरिष्ठम प्राध्यापक’ का पद होता है, जो विश्वविद्यालय सेवाओं के ‘रीडर’ (प्रवाचक) के बराबर होता है.

और जान लीजिए: कॉलेज अथवा यूनिवर्सिटी सेवाओं में ‘आचार्य’ और ‘अध्यक्ष’ पद एक व्यक्ति को उसकी सेवा अवधि तक-ही मिलते हैं, लेकिन फिर भी विद्वान लोग ताउम्र इन पदनामों को छोड़ना नहीं चाहते और ‘पूर्व’ या ‘सेवानिवृत्त’ शब्द लिखने को अपनी तौहीन समझते हैं! वैसे इनमें से अधिकांश ने पीएचडी की उपाधि हासिल की हुई होती है, पर ये अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लिखना नहीं चाहते, रिटायर होने के बाद भी! एक और दिलचस्प पहलू ये भी है कि भारतवर्ष में इतने सारे ‘कागज़ी’ विश्वविद्यालय उग आए हैं कि वे आचार्य और डॉक्टर वगैरह डिग्रियां खैरात में बांटते रहते हैं: ऐसी डिग्रियों से सुशोभित ‘कम पढ़े-लिखे’ लोग शेखी बघारते देखे जा सकते हैं, नाम के आगे ‘डॉक्टर’ शब्द लगाकर..!

6-7 साल में ‘मेडीकल’ की कठिन पढ़ाई कर डॉक्टर बनने वाले की उस समय बुरी गत होती है जब ‘रजिस्टर्ड मेडीकल प्रेक्टिशनर्स’ शोहरत और दौलत में उन्हें पछाड़ देते हैं! उस सांसद की क्या सूरत होती होगी, जो जब ‘पूर्व सांसद’ के घर के आगे से गुजरता है तो उसके घर के आगे एक बोर्ड गड़ा दिखता है, “सांसद कार्यालय”! बड़ी-बड़ी गाड़ियों पर काफी बड़ी नाम तख्तियां लगाए घूमते ‘भूतपूर्व’ और ‘अभूतपूर्व’ लोग तो गज़ब-ही करते हैं: खुद-को सांसद/ विधायक/ पार्षद जताकर!

एक व्यक्ति जिसे लोअर कोर्ट में प्रेक्टिस करने का महज 10-20 साल का अनुभव नहीं होता, लेकिन वो बड़े-बड़े अक्षरों में अपने दफ्तर और घर के बाहर बोर्ड टांगता है, “सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता” या “हाई कोर्ट अधिवक्ता”! हद तो तब हो जाती है, जब इस तरह के काले कोट वाले स्वयं-को ‘सीनियर लॉयर’ अथवा ‘सीनियर काउंसल’ घोषित कर देते हैं, जबकि ये विशिष्ट पदवी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही उन चुनिन्दा वकीलों को प्रदान करते हैं, जिन्होंने अद्वितीय कार्य किया है!

मीडिया के क्षेत्र में तो पदनाम का “अपहरण” करने की होड़-सी मची हुई है! जो मीडिया संस्थानों में मैनेजरी करते हैं, वे ‘प्रधान संपादक’ और ‘चैनल हेड’ के तमगे लटकाए हुए फिर रहे हैं! जो क़स्बों, तहसीलों और ज़िला मुख्यालयों पर ‘अंशकालीन संवाददाता’ हैं, वो ब्यूरो चीफ या ‘ब्यूरो’ बने रौब ग़ालिब करते देखे जा सकते हैं! ‘रिपोर्टर’ पदनाम तो जैसे अछूत बना दिया गया है! पेपर एजेंट/ हॉकर/ केबल ऑपरेटर/ बस ऑपरेटर/ शराब के लाईसेंसी/ होटलर्स/विज्ञापन एजेंसी वाले/ प्रिंटिंग प्रेस वाले/ बिल्डर्स/ कॉलोनाइजर्स/ राजनीतिक दलों के कार्यकर्त्ता व पदाधिकारी/ दलाल क़िस्म के लोग “अधिमान्य पत्रकार” बन चुके हैं…

धर्म, अध्यात्म, योग और सत्संग में तो पारंपरिक और पवित्र पदनामों को जैसे कुत्सित और कलंकित कर दिया गया है! कौन जगदाचार्य है और कौन जगदास्वामी, मालूम ही नहीं पड़ता! यही हाल जगद्गुरुओं और आचार्य महामंडलेश्वरों का भी है! इसके नीचे तो हाहाकार मचा हुआ है, पदासीन होने और रुबाब गांठने का! हर योग प्रशिक्षक योग गुरू बनने पर आमादा है! नित्य नए-नए पदनामों के सृजन हो रहे हैं और धड़ल्ले से उनका गैर-वाजिब इस्तेमाल हो रहा है, हर धार्मिक परम्परा में…..

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ये सिलसिला यहीं आकर नहीं रुकता, पर प्रसंगवश हमें यहीं रुक जाना चाहिए! क्यूंकि उक्त सब उल्लेखों का ‘जस्टीफिकेशन’ जरूरी है: किसी पद पर पदस्थापित होना और विभिन्न पदनाम लेते हुए एक निश्चित समयावधि के बाद उससे अधिकृत रूप से निवृत्त होने का विधान है. मगर उसके बाद भी यदि पदनाम को चमका-चमका कर इस्तेमाल किया जाता है, तो इसके पीछे-की मंशा हमेशा अच्छा सन्देश नहीं देती! यदि गुरू की बजाय ‘गुरू घंटाल’ मिल जाए, तो एक अध्येता की स्थिति को समझा जा सकता है! फ़र्ज़ करिए कि आप एक ‘क्वालिफाइड’ डॉक्टर की बजाय ‘रजिस्टर्ड मेडीकल प्रेक्टिशनर’ के हत्थे चढ़ जाएं! कोर्ट में काले कोट वाले की बजाय दलाल के शिकार बन जाएं! धार्मिक स्थलों पर बहुरूपिये आपको लपेट लें! जोखिम ये भी रहता है कि जिस मुद्रा को लेकर आप मार्केट में गए हैं, उसे-ही कहीं ‘छद्म’ मुद्रा घोषित नहीं कर दिया जाए…..

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