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लोग हैं कि मानते नहीं…


लोग हैं कि मानते नहीं…

अमित बिश्‍नोई

मेरठ में अप्रैल महीने की शुरूआत से ही कोरोना संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। देखते ही देखते कोरोना मरीज मिलने का आंकड़ा 210 हो गया। प्रशासन चिंता में है तो स्वास्थ विभाग परेशान, लेकिन लोग हैं कि मानते नहीं। जरा सा मौका मिला और निकल पड़े बाजार को, भीड़ भरी दुकानों में की खरीदारी और जाम का शिकार बनीं सड़कों पर धीमें-धीमें गाड़ी चलाकर वापस आ गये घर। और निकले भी अकेले नहीं, पूरा परिवार साथ लेकर चलते हैं लोग। बाजारों में खड़े होकर चाट-पकौड़ी भी खाते हैं, यार-दोस्त मिल जायें तो सड़क पर ही खड़े होकर गपशप भी कर लेते हैं। फिर अगले दिन सुबह को अखबार पढ़कर कहते हैं, कोरोना इस देश से जाने वाला नहीं है। न सरकार कुछ करती है और न ही प्रशासन। पुलिस को तो चालान काटने के अलावा कुछ और काम ही नहीं है। ऐसे थोड़े ही न जायेगा कोरोना। यह बातें हम कहते तो हैं लेकिन कोरोना जायेगा कैसे यह जानते हुए भी अंजान बने रहते हैं।

जी हां साहब, ये अलग मिजाज का शहर है। कहने को तरक्की पसंद शहर है, पढ़े-लिखों की संख्या भी अधिक है। क्रांतिकारी शहर है सो क्रांति की ज्वाला मन में धधकती रहती है। चिंता किसी बात की नहीं करते हां बातों में हर बात की फिक्र करने में सबसे आगे हैं। अब कोरोना को ही लिजिये, हर चौराहे, हर मोहल्ले और हर घर में कोरोना की चिंता करते हुए घंटो बातें की जाती हैं मगर हकीकत में चिंता कोई नहीं करता। अगर चिंता करते होते तो आबूलेन पर आपको जगमगाती लाइटों के बीच खरीदारी करने उमड़़े लोगों की भीड़ न दिखती। नाइट कर्फ्यू लगने से कुछ समय पहले तक बाजारों में जाम लगता न दिखता। अगर लोग कोरोना को रोकने का कुछ प्रयास खुद भी करते तो कोटला के बाजार रात में खरीदारों की चहल-पहल से रोशन न होते। हां ये सब भी जरूरी होता अगर शहर में कोरोना न होता।


आज हम ने जब आबूलेन पर जाकर देखा तो वहां हालात चौकाने वाले थे। नाइट कर्फ्यू से थोड़े समय पहले तक बाजार पूरी तरह से रोशन था। दुकानों पर भीड़ थी तो सामाजिक दूरी की बात करना बेमानी था। वाहनों की भारी आवाजाही से सड़क पर जाम लगा हुआ था। इसके बाद कोटला बाजार पहुंचे तो वहां भीड़ देखकर तो लग ही नहीं रहा था कि मेरठ में कोरोना नाम की कोई बीमारी है। खरीदारों की भीड़ में मास्क लगाने वालों की संख्या न के बराबर थी। दुकानदार से लेकर खरीदार तक मास्क लगाना मानों शान के खिलाफ समझ रहे थे। दुकानों पर सैनेटाइजर तो कहीं दिख ही नहीं रहा था और भीड़ इतनी की कदम बढ़ाना भी मुश्किल था। और यहां भी समय नाइट कर्फ्यू से थोड़ा पहले का ही था। न दुकानदार को दुकान बंद करने की जल्दी थी और न ही खरीदार को घर जाने की। सब काम इतनी तसल्ली से चल रहा था कि यदि कोरोना सजीव होकर यहां आ जाता तो निःसंदेह शर्म के मारे वहीं मर जाता।

मेडिकल में इलाज कराने आये लोगों को कोरोना का खतरा


मेरठ के लाला लाजपत राय मेडिकल काॅलेज में उपचार कराने के लिये प्रतिदिन मेरठ के साथ आसपास के जिलों के मरीज और उनके तीमारदार मेडिकल काॅलेज पहुंचते हैं। मगर लोगों को सामाजिक दूरी बनाकर कोरोना संक्रमण से बचाव का संदेश बार-बार देने वाला मेडिकल काॅलेज खुद अपने यहां इस नियम का पालन कराने को जागरूक नहीं है। उपचार या चिकित्सीय परामर्श से पहले पर्ची बनवाने के काउंटर पर मरीजों और उनके तीमारदारों की लंबी लाइनें लगी रहती हैं। ऐसे में इलाज कराने मेडिकल काॅलेज आये लोगों के कोरोना से बीमार होने का अंदेशा बना रहता है।
तो सिर्फ कोरोना को जिक्र कर या सिर्फ फिक्र करने से कोरोना जाने वाला नहीं है। पुलिस के चालान काटने या प्रशासन के जागरूक किये जाने से भी कोरोना समाप्त नहीं होगा। नाइट कर्फ्यू लगाने से भी नहीं रूकेगा कोरोना। यदि कोरोना को रोकना है तो पहले हमें अपने कदमों को रोकना होगा। बाजार भी जाएं और खरीदारी भी करें। लेकिन सिर्फ जरूरी होने पर ही घर से निकलें। शाम का मजा लेने या छुट्टी का लुत्फ उठाने के लिये जबरन बाजार न जायें और न ही किसी और को जाने दें। तभी कोरोना मेरठ से जायेगा और हमारे अच्छे दिन और सुहानी शाम लौटकर आयेगी।

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