जन्मशती पर विशेष —————

नौशेरा के शेर ब्रिगेडियर उस्मान,जिसने पाकिस्तान को चटाई थी धूल
 
 
शेर ब्रिगेडियर उस्मान

आज देश भले ही नौशेरा के इस शेर की जन्म तिथि भूल गया हो लेकिन यह वहीं ब्रिगेडियर उस्मान हैं जिन्होंने नौशेरा में पाकिस्तान को धूल चटा दी थी। नौशेरा का शेर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जन्म 14 जुलाई 1912 को हुआ था। 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान कार्रवाई में मारे गए भारतीय सेना के सर्वोच्च रेंकिंग अधिकारी थे। एक मुस्लिम के रूप में, उस्मान भारत के "समावेशी धर्मनिरपेक्षता" का प्रतीक बन गए। "भारत के विभाजन के समय उन्होंने कई अन्य मुस्लिम अधिकारियों के साथ पाकिस्तानी सेना में जाने से इनकार कर दिया था। उन्होंने भारतीय सेना के साथ काम करना जारी रखा। वह जुलाई 1948 में जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तानी सैनिकों से लड़ते हुए मारे गए थे। बाद में उन्हें दुश्मन के सामने वीरता के लिए दूसरे सर्वोच्च सैन्य अलंकरण महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। ब्रिगेडियर उस्मान को सेना में 'नौशेरा का शेर' कहा जाता है। 36 साल की उम्र में अपने प्राणों की आहूति देने वाले इस देशभक्त में कुछ तो खास रहा ही होगा। तभी तो दिल्ली आए उनके पार्थिव शरीर को खुद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने रिसीव किया था। उस्मान की शुरुआती पढ़ाई बनारस में हुई। उनके पिता पुलिस में थे लेकिन, उस्मान की इच्छा सेना में भर्ती होने की थी। ब्रिटिश शासनकाल में किसी भारतीय के लिए सेना में अफ़सर बनने के अवसर सीमित थे लेकिन उन्होंने अपनी होशियारी से ये मुकाम पा लिया। उर्दू में सिद्धहस्त होने के कारण अतिरिक्त तरक्की भी मिली।  बलोच रेजिमेंट की कमान के अलावा कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभाते हुए उस्मान ने खूब नाम कमाया। वे ब्रिटिश आर्मी में रहते हुए सेकंड लेफ्टिनेंट से कप्तान और फिर मेजर के ओहदे तक पहुंचे।   अलग-अलग ऑपरेशंस में उनकी बहादुरी चर्चा का विषय बनती जा रही थी।  यानी सबकुछ वैसा ही हो रहा था। जैसा कि एक बहादुर सैनिक अफसर के जीवन में होता है लेकिन देश के बंटवारे का समय नजदीक आते आते उस्मान पर दबाव बढ़ने लगा।

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पाकिस्तानी हुक्मरानों की उस्मान पर नजर थी। एक कुशल और बहादुर सैनिक अफसर वो भी मुसलमान, उन्हें और क्या चाहिए था? उस्मान के पास प्रस्ताव भेजा गया कि वे पाकिस्तानी सेना का हिस्सा बन जाएं उन्हें आगे चलकर सेना अध्यक्ष बना दिया जाएगा। दुनिया का दस्तूर है इंसान पैसे और तरक्की की खातिर कहीं भी जाने के लिए सहर्ष तैयार हो जाता है उस्मान के पास भी ये गोल्डन टिकट आया वे पाकिस्तान जाने का फैसला ले सकते थे उस दौरान कई मुसलमानों ने ऐसा किया भी लेकिन बलूचिस्तान से लेकर बर्मा तक अपनी सैन्य सेवाएं दे चुके उस्मान यही मानते थे कि वे अपने मुल्क भारत की सीमा में रहते हैं और उसी की सेवा करते हैं वहीं मुल्क जिसकी जमीन में उनके पुरखे दफन हैं उस्मान के लिए फैसला लेना मुश्किल नहीं था। उन्होंने एक झटके में ऑफर ठुकरा दिया पाकिस्तान के प्रस्ताव पर उनके असंतोष का सम्मान किया गया पाकिस्तान के अधीन चली गई बलोच रेजिमेंट से उनका टांसफर भारतीय सेना की डोगरा रेजिमेंट में कर दिया गया जिसका शहादत देने तक वे हिस्सा रहे।

ब्रिगेडियर उस्मान के फैसलों में इतनी तेजी और दूरदर्शिता थी जिसके आगे पर उन पर शंका करने वाले नतमस्तक रह गए। अपने मिशन को लेकर दृढसंकल्प लिए ब्रिगेडियर उस्मान ने नौशेरा से बढ़कर फिर हमला बोला और झंगर फतेह कर लिया। वे अपनी ब्रिगेड को सबसे आगे रहकर नेतृत्व देते रहे उन्हें नौशेरा का शेर कहा जाने लगा। ब्रिगेडियर उस्मान को आर्मी चीफ बनाने का लालच दे रहा पाकिस्तान इतना बौखला गया था कि उसने उन्हें मारने वाले को 50 हजार रुपये ईनाम देने की घोषणा कर दी थी। झंगर फतेह के बाद अग्रिम चौकी का मुआयना करने निकले ब्रिगेडियर उस्मान दुश्मन की गोलीबारी की जद में आ गए और मौके पर ही शहीद हो गए। 1912 में जन्मे ब्रिगेडियर उस्मान ने तीन जुलाई 1948 को आखिरी सांस ली। पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ उनका दिल्ली में अंतिम संस्कार हुआ। जिसमें प्रधानमंत्री नेहरू, उनकी पूरी कैबिनेट के अलावा उस दौरान भारत में ब्रिटिश सरकार के आखिरी गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन भी शामिल हुए। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से भी सम्मानित किया गया।