Pura Mahadev Mandir: कजरी वन में स्थित परशुरामेश्वर पुरा महादेव मंदिर के बारे में जान हो जाएंगे हैरान

 
mahadev mandiir

बागपत। जनपद के पुरा महादेव स्थित परशुरामेश्वर महादेव मंदिर की अपनी अलग ही मान्यता है।  सावन की शिवरात्रि पर यहां पर लाखों कांवड़ियां श्रद्धालु मंदिर में पहुंचकर भगवान शिव पर गंगाजल से जलाभिषेक करते हैं। सुबह तीन बजे से ही पुरा महादेव में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने के लिए लाइनें लग जाती है।  परशुरामेश्वर महादेव मंदिर कजरी वन में स्थित है। बताया जाता है कि ऋषि जमदग्नि अपनी पत्नी रेणुका के साथ इसी वन में रहते थे। आश्रम में ऋषि की पत्नी रेणुका प्रतिदिन कच्चा घड़ा बनाकर हिंडन नदी से जल भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक करती थीं। एक बार यहां राजा सहस्त्रबाहु शिकार खेलते पहुंच गए। जमदग्नि ऋषि की अनुपस्थिति में रेणुका राजा सहस्त्रबाहु का सेवा सत्कार किया। राजा सेवा भाव देखकर आश्चर्यचकित हुए। एक जंगल में इतनी व्यवस्थाएं कैसे हो सकती हैं।

Pura Mahadev Mandir

पौराणिक कथा में जैसा कि बताया गया है कि राजा ने जिज्ञासापूर्वक जब ऋषि पत्नी रेणुका से कारण पूछा तो उन्होंने अपनी कामधेनु गाय का जिक्र करते हुए उसके बारे में बताया। राजा कामधेनू गाय को बलपूर्वक ले जाने लगा तो रेणुका ने विरोध किया। राजा रेणुका को भी अपने साथ उठाकर ले गया। राजा ने हस्तिनापुर में अपने महल में रेणुका को कमरे में एक दिन के लिए कैद कर दिया। रेणुका आजाद होकर वापस आकर सारी बात ऋषि को बताई। इस पर ऋषि ने दूसरे पुरुष के महल में एक रात्रि रहने के कारण रेणुका को आश्रम छोड़ने का आदेश दे दिया। रे​णुका आश्रम से नहीं गई। ऋषि ने अपने तीन पुत्रों को माता का सिर धड़ से अलग करने को कहा। लेकिन ​सभी ने ऐसा करने से मना कर दिया। पिता के आदेश पर चौथे पुत्र परशुराम ने मां रेणुका का सर धड़ से अलग कर दिया। परशुराम को बाद में पश्चाताप हुआ। उन्होंने शिव की तपस्या आरंभ कर दी। परशुराम की तपस्या से शिव प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने उनकी माता को जीवित कर दिया। इसके साथ भगवान शिव ने परशुराम को फरसा प्रदान किया। इसी फरसे से परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों का संहार किया था।

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परशुराम ने जिस स्थान पर शिवलिंग स्थापित किया। वहां पर एक मंदिर बना दिया। समय बीतने के साथ ही मंदिर खंडहर में बदल गया। कई वर्षों बाद यह मिट्टी के ढेर बन गया। कहा जाता है कि एक बार लंडोरा की रानी घूमने के लिए वहां पर पहुंची। उस टीले पर आकर उनका हाथी रुक गया। लाख कोशिशों के बाद भी हाथी ने टीले पर पैर नहीं रखा। इस पर रानी को आश्चर्य हुआ तो टीले की खुदाई आरंभ करवाई। खुदाई में एक शिवलिंग प्रकट हुआ। रानी ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। अब यही शिवलिंग आज पुरामहादेव स्थित परशुरामेश्वर मंदिर के नाम से पूरे देश में विख्यात है।