Bilvkeshwar Mahadev Mandir: हजारो साल की तपस्या के बाद माँ पार्वती को मिले थे "भोलनाथ"

 
Bilvkeshwar Mahadev

हरिद्वार। भोले भंडारी, औघड़दानी, जटाधारी और महादेव, ऐसे न जाने कितने नाम से भगवान शिव को जाना जाता है. भोलेनाथ के जितने अलग-अलग रूपों में पूजा जाता है उतना शायद ही किसी और देवता को पूजा जाता हो. आज हम आपको ऐसे स्थान के दर्शन कराते है जंहा पर माँ पार्वती ने भगवान् शिव को पाने के लिए 3000 साल तक कठोर तपस्या करनी पड़ी थी. शिव की अर्धांगनी बनने के लिए माँ पार्वती ने हरिद्वार के बिल्व पर्वत पर तप किया था. आज वही स्थान बिल्केश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है.  

धर्मनगरी हरिद्वार को हर+द्वार और हरि+द्वार दो नामो से जाना जाता है. हरिद्वार का मतलब भगवान् विष्णु की नगरी जबकि हरद्वार का मतलब भगवान् शिव की नगरी. भगवान् शिव की आराधना के लिए यु तो हर दिन उत्तम माना जाता है लेकिन सावन का माह भगवान् शिव का सबसे प्रिय मास है इसीलिए शिवभक्त भोले को मानाने के लिए इस महीने में हरिद्वार खींचे चले आते है. हरिद्वार, यही वह नगरी है जहाँ शिव को दो बार मिली अपनी जीवन साथी, पहले राजा दक्ष का पुत्री सती के यज्ञ कुंङ में भस्म होने के बाद सती ने हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म  लिया था. माता पार्वती ने भगवान् भोले को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी. हरिद्वार में विल्वकेश्वर पर्वत ही वह जगह है जहाँ पार्वती ने शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी.

सावन में जलाभिषेक के लिए उमड़ता हुजूम 

हरिद्वार में विल्व पर्वत की तलहटी में स्थित बिल्वकेश्वर महादेव का मंदिर शिवभक्तों के लिए खासा महत्त्व रखता है. यह सिद्धपीठ हरिद्वार के पश्चिम में हर की पौङी थोङा ही दूरी पर राजाजी राष्ट्रीय पार्क में स्थित है. चारों और बेल के पेङों से घिरे हुए इस मनोरम स्थान पर मन को बहुत शान्ति मिलती है. मान्यता है कि यहीं पर पार्वती ने शिव को वर रूप में पाने के लिए 3 हजार साल तक कठोर तप किया था.

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चूड़ियों से खोद कर बनाया गौरी कुंड 

इस मंदिर परिसर से कुछ दूरी पर एक कुंड भी है जिसे गौरी कुंड के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि तपस्या के दौरान माता पार्वती ने अपनी चूडियो से खोदकर इस कुंड का निर्माण किया था और इसी कुंड के जल में वो स्नान किया करती थी. मंदिर के मुख्य पुजारी पुनीत महाराज बताते है कि गौरी कुंड के जल में पांच रविवार स्न्नान करने से संतान रत्न की अवश्य प्राप्ति होती है.जिन कन्याओ के विवाह में कोई भी अड़चन हो तो पांच रविवार इस कुंड के जल में स्नान करने सारी अड़चने दूर हो जाती है और निश्चित ही उनका विवाह हो जाता है. साथ ही ये मान्यता भी है कि गौरी कुंड के जल में स्नान करने से किसी तरह का चर्म रोग ठीक हो जाता है.

बेलपत्र,मिसरी व् धतूरे से प्रसन्न होते है भोले 

वैसे तो साल भर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान् शिव के दर्शन करने बिल्केश्वर मंदिर आते रहते है. सावन की शिवरात्री के महापर्व के दिन तो यहाँ पर श्रधुलुओ का ताँता लगा रहता है. मान्यता है कि जो भी भक्त यहाँ पर सचे मन से भगवान् भोलेनाथ का जलाभिषेक करने के बाद उन्हें बेलपत्र मिसरी व् धतूरे के पुष्प अर्पित करता है उसकी हर मनोकामना पूरी होती है.