Thursday, October 21, 2021
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गणेश विसर्जन का शुभ मुहूर्त और करने की विधि

गणेशोत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन हो जाता है और जिस तरीके से लोग बप्पा को अपने घर लेकर आते है उसी तरीके से उनकी विदाई भी करते है। आज के दिन लोग गणेश भगवान की प्रतिमा का विसर्जन कर उनकी विदाई करते है और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते है। आज के दिन आपको तालाब, नदी, समुद्र सभी के पास भारी मात्रा में भीड़ मिलेगी जहा लोग भगवान गणेश को विसर्जित करते हुए दिखेंगे। भगवान गणेश की विदाई के साथ लोग अपने घर परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते हैं और भगवान गणेश से आशीर्वाद प्राप्त करते है।

गणपत्ति बप्पा
Image Credit: Naeem

क्या है गणेश विसर्जन का शुभ मुहूर्त?
भगवान गणेश को विसर्जित करने का शुभ मुहूर्त सुबह 07:40 से दोपहर 12:15 बजे तक है। दोपहर में भगवान गणेश को विसर्जित करने का शुभ मुहूर्त 01:46 से 03:18 तक रहेगा और अभिजीत मुहूर्त की शुरुआत सुबह 11:50 से 12:39 के बीच में होगी। आप ब्रह्म मुहूर्त में भी विसर्जन कर सकते है जो सुबह 04:35 से 05:23 तक है और अमृत काल रात 08:14 से 09:50 तक रहेगा। आज के दिन (19 सितंबर) को राहुकाल शाम 04:30 से 6 बजे तक रहेगा और इस काल में विसर्जन ना करे।

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गणपत्ति बप्पा
Image Credit: Naeem

गणेश विसर्जन करने की शुभ विधि
गणेश विसर्जन करने से पहले स्वयं स्नान करे और गणेश जी की प्रतिमा की पूरी विधि-विधान के साथ पूजा करें। गणेश भगवान को मोदक अधिक प्रिय है, उन्हें मोदक और फल का भोग लगाए और उनकी आरती करते हुए उनसे विदा लेने की प्रार्थना करे।

गणपत्ति बप्पा
Image Credit: Naeem

भगवान गणेश को विदा करने से पहले उन्हें लकड़ी के पटरे पर गुलाबी कपड़ा बिछा कर रखे और उनके साथ फल, फूल, वस्त्र और मोदक की पोटली भी रखे। उनके विसर्जन के दौरान चावल, गेहूं, पंचमेवा और कुछ सिक्को की पोटली बनाये और उनके पास रखे। विसर्जन करने से पूर्व भगवान गणेश की आरती करे और उनको अपनी सभी मनोकामनाएं बताये और अपने कष्टों को दूर करने के लिए कहे।

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गणपत्ति बप्पा
Image Credit: Naeem

इसके साथ -साथ अपनी सभी गलतियों के लिए माफ़ी मांगे और अगले वर्ष आने को निमंत्रित करे। इसके पश्चात उन्हें पानी में विसर्जित करते हुए मंत्र का जाप करे जो निम्नलिखित है –
ॐ गं गणपतये नम:, वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ। निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।
ॐ एकदन्ताय विद्धमहे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥

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