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जीत -हार से को पीछे छोड़ अब किसान हित की सोचें


जीत -हार से को पीछे छोड़ अब किसान हित की सोचें

सुनील शर्मा।

केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों को किसानों के हित में बताया गया था। यह दावा किया गया था कि इन कानूनों के लागू होने से किसानों की आय में वृद्धि होगी। मगर इन तीनों कानूनों के विरोध में किसान संगठनों के नेतृत्व में देशभर के किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया। दिल्ली के बॉर्डर पर किसान धरना देकर बैठ गए। 14 महीने तक चले किसान आंदोलन के बाद शुक्रवार को पीएम मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी। इस फैसले को विपक्षी दल मोदी सरकार की हार के रूप में।देख रहे है। विपक्षी दल भी अब विवादित कृषि कानूनों के वापस लिए जाने का श्रेय खुद लेने में जुट गए हैं।

कृषि कानूनो की वापसी से किसकी हार या किसकी जीत हुई अब इस बात से आगे बढ़ कर किसानों के हित में सोचना आवश्यक है। क्योंकि 14 महीने तक चले आंदोलन में सभी विपक्षी दलों को राजनीतिक लाभ मिला है, लेकिन यदि किसी को नुकसान हुआ है तो वह सिर्फ किसान ही है।

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कृषि कानून लागू होने से किसानों को लाभ होता या नुकसान इस बात से इतर हमें यह समझना होगा की अब भारतीय कृषि 14 महीने पहले वाली स्थिति में आ गयी है जो किसानों के लिए बहुत अच्छी नहीं थी। अब क्योंकि विवादित तीनों कृषि कानून वापस हो चुके हैं तो किसानों को भी यह तय कर लेना चाहिए की आखिरी उनका हित किस में है। सरकार से एमएसपी पर कानून लाने की मांग करना भी बेहतर साबित हो सकता है। इससे किसानों को आपनी फसल की लागत मिलने की गारंटी मिलेगी। यह भी विचार करना होगा कि कृषि को औऱ अधिक लाभकारी कैसे बनाया जाए ताकि खेती से विमुख हो चुके युवाओं के समक्ष कृषि एक व्यवसाय के रूप में उपलब्ध रहे।

वहीं विवादित कृषि कानूनों में खामियां बताने वाले किसान संगठनों औऱ राजनीतिक दलों की भी ये जिम्मेदारी है की अब वह संगठित हुए किसानों के हित मे सोचे और उनकी मांगों को सरकार के सामने मजबूती से रखे। अब किसानों का हित करने के लिए नए उपाय अपनाए जाना भी बेहद आवश्यक है। खेती में परंपरागत तरीकों के साथ नवीनतम तकनीक का प्रयोग करना किसानों के लिए लाभप्रद होगा। एमएसपी पर कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव भी बनाया जा सकता है। वहीं किसानों की आवश्यकताओं को समझते हुए नए कानून, योजनाओ को लाने की मांग भी की जा सकती है।

लेकिन इसके लिए आवश्यक है की राजनीतिक आकांक्षाओ को पीछे छोड़ कर सभी किसान संगठन औऱ राजनीतिक दल किसान को वोटर के रूप में न देखे। इस बार वह सिर्फ अन्नदाताओं के हित में ही सोचें। कुछ ऐसा करें की अब किसानों को कभी भी धरना – प्रर्दशन करने की जरूरत न पड़े।

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कोई कानून गलत है यह कहना आसान है मगर सही कानून क्या होगा, यह बताना औऱ उसके समर्थन में सभी किसान भाइयों को एकजुट करना मुश्किल तो है मगर नामुमकिन नहीं। आजाद हिन्दुस्तान में धरती पर बैठने को मजबूर अन्नदाता को अब तो उसका हक दे दीजिए। एक बार तो किसान को वोटर नहीं परिवार के रूप में देखिए, एक बार तो उसके जीवन मे आर्थिक उन्नति लाने का प्रयास कीजिए। कृपया इस बार तो किसानों के लिए भी सोच लीजिए…

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