अमित बिश्नोई
वैसे तो पूरे देश की निगाहें इस समय अमेठी और रायबरेली सीट पर हैं , कांग्रेस पार्टी यहाँ से किसे चुनावी मैदान में उतारेगी, एक सस्पेंस बना हुआ है, हालाँकि रायबरेली सीट से भाजपा ने भी अपना उम्मीदवार घोषित न करके इस सस्पेंस को और बढ़ाया हुआ है लेकिन इन दो सीटों के अलावा एक और सीट कैसरगंज की है जिसकी चर्चा अमेठी और रायबरेली से कम नहीं है. अमेठी और रायबरेली पर कांग्रेस पार्टी को लगातार घेरने वाले मोदी जी और उनकी पार्टी कैसरगंज पर चुप्पी धारण किये हुए हैं, इस सीट पर कौन उम्मीदवार होगा इसपर सिर्फ चर्चाएं ही हैं. अमेठी और रायबरेली की तरह कैसरगंज का चुनाव भी पांचवें चरण में ही और नामांकन की अंतिम तिथि 3 मई है, यानि अब सिर्फ एक दिन और बाकी है. कैसरगंज से अभी बाहुबली सांसद बृजभूषण शरण सिंह सांसद हैं , वही बृजभूषण जिनपर देश की महिला पहलवानों ने यौन शोषण का आरोप लगाया था, जिनके खिलाफ दिल्ली के जंतर मंतर पर महीनों प्रदर्शन हुआ था, और इस पूरे मामले पर प्रधानमंत्री मोदी आजतक खामोश हैं. एकतरह से कैसरगंज की सीट प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक दुखती रग बन चुकी है और यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी, नामांकन प्रक्रिया समाप्त होने के 36 घंटे पहले तक तय नहीं कर पा रहे हैं कि बृजभूषण सिंह को टिकट दिया जाय या नहीं।
कैसरगंज में भाजपा और मोदी जी धर्म संकट में फंसे हुए हैं. बृजभूषण सिंह को टिकट देने का मतलब पहले से ही आक्रमक कांग्रेस पार्टी को हमले करने का एक और मौका देना और बृजभूषण सिंह को टिकट नहीं देने का मतलब क्षेत्र के कद्दावर नेता के खिलाफ जाना। हालाँकि बीच के रास्ते के लिए बृजभूषण शरण सिंह के बेटे को टिकट देने की बात हो रही है लेकिन बृजभूषण शरण सिंह एक पानीदार नेता हैं, बेटे के लिए टिकट पर राज़ी होना उनके लिए अंतिम विकल्प होगा, भाजपा का ये बाहुबली नेता 2009 से लगातार चुनाव जीतता आ रहा है, चुनाव तो मेरठ के अग्रवाल साहब भी लगातार जीत रहे थे लेकिन भाजपा ने उनकी जगह रील वाले राम को उतार दिया और उसका कोई ख़ास विरोध भी नहीं हुआ लेकिन कैसरगंज का मामला अलग है और बृजभूषण शरण सिंह मेरठ वाले राजेंद्र अग्रवाल भी नहीं हैं जो इतनी आसानी से सरेंडर कर दें फिर वो चाहे मोदी जी ही क्यों न हों. बृजभूषण शरण सिंह का कद कितना बड़ा है इसका अंदाजा तो इस बात से चलता है कि महिला पहलवानों के मामले में पूरे देश में हंगामा होने के बावजूद मोदी जी या उनकी सरकार बृजभूषण को कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष पद से हटा नहीं पायी थी, वो तो सुप्रीम कोर्ट के दखल से बृजभूषण शरण सिंह को हटना पड़ा था, इसके बावजूद भी बृजभूषण का जलवा ये रहा कि अपने ही आदमी को उसने वहां पर बिठाया।
कहने का मतलब बृजभूषण शरण सिंह भाजपा और मोदी जी के लिए एक ऐसी बाधा बने हुए हैं जिसे हटाने की हिम्मत दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा और खुद को सबसे मज़बूत कहने वाले नेता मोदी जी भी नहीं जुटा पा रहे हैं। खैर भाजपा यहाँ से किसे टिकट देगी, ये जल्द सामने आ जायेगा, फिलहाल बसपा ने कैसरगंज से एक ब्राह्मण उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को रोचक बना दिया है, इंडिया गठबंधन में ये सीट सपा के हिस्से में है, वो भी रास्ता देख रही है कि भाजपा बृजभूषण शरण सिंह को टिकट देने का जुआ खेलेगी या फिर उसके बेटे को मैदान में उतारेगी। भाजपा के लिए अब ये मात्र एक लोकसभा सीट नहीं रह गयी है, वो किसे उम्मीदवार बनाएगी, देखने वाली बात ये है क्योंकि इसका असर काफी दूर तक जायेगा बिलकुल वैसे ही जैसे अमेठी और रायबरेली से कांग्रेस पार्टी किसे उम्मीदवारी बनाती है और उम्मीदवारी की बात भी दूर तक जाने की बात कही जा रही है.
बृजभूषण शरण सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि भाजपा आला कमान जानता है कि बृजभूषण शरण सिंह को साइड करना उसे कितना भारी पड़ सकता है. बृजभूषण की इस क्षेत्र में अपनी साख है और अपनी पहचान है, बृजभूषण भले ही एक भगवा पार्टी का नेतृत्व करते हों लेकिन कैसरगंज का मुस्लिम वोटर भी बृजभूषण सिंह का समर्थक है क्योंकि बृजभूषण शरण अपने क्षेत्र के हर वर्ग की मदद को हमेशा आगे रहते हैं. फिलहाल तो जो जानकारी सामने आ रही उसके हिसाब से इस बात पर सहमति बन चुकी है कि बृजभूषण के बेटे को कैसरगंज से चुनाव लड़ाया जायेगा, बृजभूषण भी इस फॉर्मूले पर राज़ी बताये जाते हैं लेकिन रायबरेली और अमेठी की तरह कैसरगंज ने भी VVIP सीट में अपना नाम तो ज़रूर दर्ज करवा लिया है, सिमें कोई शंका नहीं है।
