By: Dheeraj Upadhyay
लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 को देखते हुए सभी पार्टियों ने वोटरों को साधने के लिए अपनी चुनावी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इसी क्रम में भाजपा ने भी अपने 2017 के सफल सोशल इंजीन्यरिंग फार्मूले (सवर्ण + गैर यादव + गैर जाटव) के बाद अब दलित जाटव वोटरों को भी अपने साथ जोड़ने का प्रयास शुरू कर दिया है। हालांकि जाटव समाज अभी तक बसपा के कोर वोटर के रूप में मायावती के साथ तटस्थ रहा है।
गौरतलब है कि भाजपा यूपी में पार्टी को 2014 से लगातार मिल रहे 40 फीसदी वोट बैंक को एकजुट रखने के साथ जाटवों को साधने के लिए नयी चुनावी रणनीति पर कार्य कर रही है। भाजपा अब गैर जाटव से आगे बढ़कर दलित पर फोकस कर रही है, चाहे वो जाटव हो या पासी या फिर कोरी या अन्य। पार्टी ने 2022 में इस समीकरण को साधने के लिए केंद्र से लेकर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार में दलितो को प्रतिनिधित्व देकर उन्हें साधने का पूरा प्रयास किया है।
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BJP ने जाटव समुदाय से आने वाले कांता कर्दम को राज्य सभा भेजने के साथ उन्हें यूपी में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया है, तो दूसरी तरफ अशोक जाटव को योगी कैबिनेट में मंत्रीपद दिया है। इसके अतिरिक्त जाटव समुदाय से आने वाले डॉ. रामबाबू हरित को भी यूपी अनुसूचित जाति आयोग की कमान सौंपी गई है।
इससे पहले मोदी मंत्रिमंडल विस्तार में यूपी के गैर-जाटव दलित समुदाय के तीन मंत्रियों कौशल किशोर (पासी), एसपी बघेल (गडेरिया-धनगर) और भानु प्रताप वर्मा (कोरी) को शामिल किया गया था।
इसके अलावा पार्टी ने महिला जाटव नेता और उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को त्यागपत्र दिलाकर प्रदेश उपाध्यक्ष बनाते हुए उन्हें यूपी में जन आशीर्वाद यात्रा, एससी-एसटी वर्ग सम्मेलन के साथ इस समुदाय को रिझाने का जिम्मा भी दिया है।
यूपी में 22 फीसदी दलित वोट बैंक का गणित
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में करीब 22 फीसदी दलित वोटर है, जिसमें 12 फीसदी जाटव और लगभग 10 फीसदी गैर-जाटव हैं। इनमें जाटव करीब 56% तो गैर-जाटव में पासी 16%, धोबी, वाल्मिकी और कोरी लगभग 15% वहीं गोंड, धानुक और खटीक 5 फीसदी के करीब है।
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बता दे कि 2017 यूपी चुनाव में भाजपा को 86 दलित आरक्षित सीटों में से 76 सीटों पर जीत मिली थी जबकि बसपा को केवल दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। सूबे में दलित वोटरों को लेकर प्रमुख लड़ाई भाजपा और बसपा में है। आँकड़ो के अनुसार 2017 यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा को 62% फीसदी और भाजपा को 24 फीसदी दलित वोट मिले थे। भाजपा इसी वोट बैंक को 2022 में और बढ़ाना चाहती है।

