टिहरी गढ़वाल-अभी तक आपने मंदिरों में पूजा अर्चना करने की जिम्मेदारी को का निर्वहन करते केवल ब्राह्मणों को ही देखा होगा लेकिन आज हम आपको उत्तराखंड के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताते हैं जहां पर पूजा करने का अधिकार एक राजपूत को दिया जाता है. दुनिया का शायद यह पहला ऐसा मंदिर होगा जहां पर पूजा पाठ का जिम्मा किसी राजपूत के पास है. हम बात कर रहे हैं 52 शक्तिपीठों में से एक प्रसिद्ध कुंजापुरी मंदिर की. ऋषिकेश से 25 किलोमीटर दूर समुद्र तल से 1676 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मां कुंजापुरी के मंदिर में पुजारी भंडारी जाति के राजपूत को पूजा करने का अधिकार दिया जाता है. जिन्हें बहुगुणा जाति के ब्राह्मण दीक्षा देते हैं उसके बाद ही उन्हें इस मंदिर में पूजा अर्चना का अधिकार प्राप्त होता है.
मां सती के ‘कुंज’ गिरने पर कहलाया “कुंजापुरी मंदिर”
राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव को ना अपमानित करने पर माता सती ने जब यज्ञ कुंड में छलांग लगा दी उसके बाद भगवान भोलेनाथ माता सती के शव को लेकर हिमालय की ओर चले तब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि भगवान भोलेनाथ को किसी तरह से शांत करें तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर को 51 हिस्सों में विभाजित कर दिया जहां-जहां भी शरीर के यह हिस्से गिरे वहां पर आज सिद्ध पीठ स्थापित है. माना जाता है कि यहां पर माता सती के कुंज यानी बाल गिरे थे यही वजह है कि इस मंदिर का नाम कुंजापुरी मंदिर पड़ा.
प्रकृति का अनुपम छटा
धार्मिक मान्यताओं के अलावा कुंजापुरी मंदिर की एक अलग ही प्राकृतिक सौंदर्य को समेटे अलग पहचान है शिवालिक रेंज की उत्तम चोटियों में से एक चोटी पर स्थापित इस मंदिर पर आकर आपको प्राकृतिक सौंदर्य का है अद्भुत दर्शन देख मिलेंगे कहा जाता है कि कुंजापुरी मंदिर टिहरी गढ़वाल के तीन सिद्ध पीठों का एक पवित्र त्रिकोण है जिसमें पहला चंद्रबदनी दूसरा सुरकंडा देवी और तीसरा कुंजापुरी मंदिर है यह भी माना जाता है कि इन तीन सिद्ध पीठों को आदि गुरु शंकराचार्य ने स्थापित किया था. यह भी कहा जाता है कि मंदिर के शिखर से साफ मौसम में मेरठ तक का देखा जा सकता है.
