जानिए आगरा की जामा मस्जिद की कुछ खास बातें

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दुनिया के सात अजूबों में से एक ताज महल आगरा में स्थित है। इसीलिए आगरा भारत का एक ऐसा राज्य है जो पूरी दुनिया में मशहूर है क्योंकि यहां ताज महल की खूबसूरत कलाकारी देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। वैसे आगरा में ताज महल के अलावा भी कई दर्शनीय स्थल हैं जहां पर्यटक इतिहास से रूबरू हो सकते हैं।

वैसे तो आप आगरा का किला, खासमहल, पंचमहल, जहांगीर महल, अंगूरी बाग, महताब बाग और फतेहपुर सीकरी आदि घूमने का प्लान बना सकते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ताज महल के बाद जामा मस्जिद आगरा की मशहूर जगहों में से एक है, दोनों ही जगहों को शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया। ऐसा कहा जाता है कि शाहजहाँ ने ताज को अपनी पत्नी मुमताज की याद में और जामा मस्जिद को अपनी बेटी जहाँआरा की याद में बनवाया था।

ताज महल की कहानी तो आपने कई बार सुनी होगी , लेकिन क्या आप जामा मस्जिद के बारे में अभी सुना है ? अगर नहीं तो आइए जानते हैं जामा मस्जिद से जुड़े दिलचस्प इतिहास के बारे में।

आगरा की जामा मस्जिद का इतिहास क्या है?

आगरा की जामा मस्जिद का इतिहास मुगलों से जुड़ा है। इसे शाहजहाँ ने अपनी बेटी जहाँआरा बेगम के लिए बनवाया था। इसलिए इस मस्जिद को मस्जिद-ए-जहनुमा भी कहा जाता है। इसका निर्माण करीब 1648 में मध्य हुआ था, और इसको बनाने में कई लाख रुपये भी खर्च हुए थे।

जामा मस्जिद लाल बलुआ पत्थर से बनी है और एक ऊंचे मंच पर स्थित है। आज आगरा शहर के मध्य में बनी जामा मस्जिद शहर की प्रमुख मस्जिदों में से एक है। ईद की मुख्य नमाज यहीं अदा की जाती है।

मस्जिद वास्तुकला

मस्जिद का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया है और इसे सफेद संगमरमर से सजाया गया है। मस्जिद की दीवार में इस्तेमाल की गई टाइलों को ज्यामितीय रूपांकनों से सजाया गया है। इस मस्जिद की लंबाई 130 फीट और चौथाई 100 फीट है। जामा मस्जिद में लकड़ी और ईंट का भी इस्तेमाल किया गया है.

ऊंची नींव पर बनी इस मस्जिद में प्रवेश के लिए पांच घुमावदार दरवाजे हैं। इसमें लाल बलुआ पत्थर से बने तीन विशाल गुंबद भी हैं। इसकी दीवार और छत पर नीले रंग के पेंट का इस्तेमाल किया गया है। कुल मिलाकर यह मस्जिद बेहद खूबसूरत है।

प्रार्थना की जाती है

वैसे आप इस मस्जिद को देखने जा सकते हैं। लेकिन यहां नमाज पढ़ी जाती है, जहां हर शुक्रवार को मुस्लिम वर्ग जुटता है. ईद या त्योहारों पर यहां इतनी भीड़ होती है कि पैर रखने तक की जगह नहीं मिलती। वैसे, यह इतना विशाल है कि यहां एक समय में 10 हजार से ज्यादा लोग इकट्ठा हो सकते हैं।

संत शेख सलीम चिश्ती का मकबरा

कहा जाता है कि इसी मस्जिद के परिसर में महान सूफी संत शेख सलीम चिश्ती की कब्र भी मौजूद है। सच्ची कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक होने के नाते, सम्राट अकबर ने सूफी संत और मस्जिद के सम्मान में एक शानदार शहर समर्पित किया। सम्राट ने संत की मृत्यु के बाद लाल बलुआ पत्थर से बनी उनकी शाही कब्र भी बनवाई।

जामा मस्जिद का बरामदा बहुत बड़ा है

इस मस्जिद का बरामदा दो तरफा है, जो देखने में बेहद खूबसूरत है। इस मस्जिद की छत पर तीन गुंबद भी बनाए गए हैं और दरवाजे पर फारसी भाषा में एक शिलालेख लगाया गया है। इसमें आपको मुख्य जानकारी मिलेगी.

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