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कर्नाटक चुनाव का बिगुल बजा, भाजपा-कांग्रेस का लिटमस टेस्ट

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कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव आयोग द्वारा तारीखों के एलान के बाद शंखनाद हो चुका है. चुनाव आयोग के मुताबिक 10 मई को मतदान और 13 मई को मतगणना. देश में मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम और उथल पुथल के बीच दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी और देश की सबसे पुरानी पार्टी का लिटमस टेस्ट होगा और अंदाजा लगेगा कि 2024 का सफर किस पार्टी के लिए आसान और किसके लिए मुश्किल होने जा रहा है. कर्नाटक की सत्ता में इस समय भाजपा मौजूद है, बोलें तो डबल इंजन की सरकार है. इसके बाद तीन और प्रमुख राज्यों , राजस्थान मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी विधानसभा चुनाव होने हैं और इन तीनों ही राज्यों में भी मुकाबला भाजपा -कांग्रेस में आमने सामने का है, ऐसे में कर्नाटक दोनों ही पार्टियों के लिए न सिर्फ सबसे महत्वपूर्ण है बल्कि एक संकेत भी देने वाला है कि आगे क्या हो सकता है।

क्या दिल्ली की गर्मी कर्नाटक पहुंचेगी

अडानी मामले और राहुल गाँधी की सदस्यता छिनने के बाद देश के राजनीतिक हालात वैसे भी काफी गर्म हो गए हैं, तो देखने वाली बात ये होगी कि कर्नाटक चुनाव में ये गर्मी कितना असर दिखाती है. जहाँ तक 2018 में हुए पिछले चुनाव की बात करें तो किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला मगर कांग्रेस ने बड़ी पार्टी होकर भी जेडीएस को मौका देकर सरकार बनाई यह अलग बात है कि भाजपा ने साम दाम दण्ड भेद, सभी हथकंडे अपनाकर भाग्य से किंग बने कुमारस्वामी को 14 महीने में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया और येदियुरप्पा की ताजपोशी करा दी. वैसे बाद में उन्हें भी हटाकर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया गया जिनकी पहचान अब paycm के रूप में है.

भाजपा की बढ़ती परेशानियां

कर्नाटक में राजनीतिक हालात लगभग वैसे ही हैं हालाँकि करप्शन और रिश्वतखोरी को लेकर भाजपा सरकार घिरी हुई है , कह सकते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे को आम जनता तक पहुंचा कर भाजपा को बैकफुट पर धकेल दिया है. देखा जाय तो माहौल इस समय कांग्रेस के पक्ष में दिखाई देता है. हालाँकि चुनाव आयोग ने 10 मई तक चुनाव पहुंचाकर भाजपा को ज़्यादा से ज़्यादा समय दिया है, लगभग डेढ़ महीने का, ताकि डैमेज कंट्रोल किया जा सके. वहीँ कांग्रेस पार्टी के पक्ष में माहौल तो पहले से ही था और अब राहुल गाँधी की सदस्यता छीने जाने के बाद उसके पास विक्टिम कार्ड भी आ गया है. साउथ के लोग वैसे भी बड़े भावुक होते हैं तो ऐसे में उसे बैठे बिठाये ये मुद्दा मिल गया जिसे वो आसानी से भुना सकती है. जहाँ तक जे डी एस की बात है तो वो एकबार अपनी पुरानी भूमिका में नज़र आ रही है.

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