केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि कानूनों के विरोेध में किसान लामबंद हो रहे हैं। धरना-प्रदर्शन, महापंचायतों के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास भी किया जा रहा है। वहीं राजनीतिक दल भी सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। सरकार किसानोें को वार्ता के लिये आमंत्रित कर रही है तो किसान संगठनों की ओर से वार्ता में भाग लेने की बात कही जा रही है। मगर अब यह आंदोलन उस मोड़ पर आ गया है जहां यह आंदोलन के साथ किसान और सरकार के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बनता दिख रहा है। क्योंकि दोनों ही पक्षों की ओर से वार्ता की बातें तो कही जा रही है मगर वार्ता की पहल को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर शुरूआत कोई नहीं करना चाहता। यह स्थिति न तो स्वस्थ लोकतंत्र के लिये अच्छी है और न ही किसान या सरकार हित में है।
कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर किसान संगठन दिल्ली की सीमाओं पर धरना देकर बैठे हैं। समय-समय पर किसान आंदोलन में अलग-अलग मोड़ आते रहे। पहले तो किसानों के धरना देने पर ही दिल्ली पुलिस और किसानों में टकराव हुआ। उसके बाद किसान धरने पर बैठे और आंदोलन को तेज करने में जुटे रहे। इसी दौरान गणतंत्र दिवस पर किसानों द्वारा निकाले गये ट्रैक्टर मार्च के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा के बाद माहौल बदला और किसान आंदोलन समाप्त होते दिखाई दिया। मगर भाकियू नेता राकेश टिकैत की आंखों से निकले आंसूओं ने एक बार और किसान आंदोलन में जान फूंक दी। इसके बाद राजनीतिक दलों ने किसान आंदोलन में भागीदारी करने का पूर्ण प्रयास किया। हालांकि किसान आंदोलन का सबसे बड़ा फायदा अभी तक तो राष्ट्रीय लोक दल को मिलता दिख रहा है जिसकी पंचायतों में भारी संख्या में किसान जुट रहे हैं। वहीं देशी-विदेशी सेलेब्रिटीज के ट्वीट से माहौल कई बार गरमाया।
किसान आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार के प्रतिनिधि चिंता जताते हुए कृषि कानूनों को किसान हित में बताते रहे। वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी किसानों को वार्ता के लिये आमंत्रित कर चुके हैं। किसान संगठनों ने भी सरकार और पीएम द्वारा की गयी पहल की सराहना करते हुए बैठक की तिथि निर्धारित करने की बात कही है। मगर दुःखद बात यह है कि दोनों ही पक्ष इस गंभीर मुद्दे को लेकर ”पहले आप-पहले आप“ की नीति अपना रहे हैं। सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली बैठक को दोनों ही पक्ष अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके हैं। दोनों ही पक्ष चाहते हैं कि वार्ता की शुरूआत सामने वाला करे जिसके चलते बैठक की पहल कोई नहीं करना चाहता।
माना जा रहा है कि यदि सरकार वार्ता के लिये तिथि तय कर आमंत्रित करती है तो किसान संगठन बैठक से पूर्व किसान नेताओं पर दर्ज मुकदमंे वापस लेने और गिरफ्तार किसानों को छोड़े जाने की मांग कर सकते हैं। ऐसा कर पाने में आने वाली मुश्किलों को देखते हुए सरकार पर दबाव बढ़ेगा। इसलिये सरकार अपनी ओर से वार्ता का संदेश तो दे रही है मगर कोई तिथि निर्धारित कर किसानों को आमंत्रित करने से परहेज कर रही है। कहीं न कहीं सरकार भी चाहती है कि इस मसले पर जीत भले ही किसानों की हो मगर हार सरकार की भी न हो।
पुर्नजीवित हुए किसान आंदोलन में जुटती किसानों की भीड़ से उत्साहित किसान संगठन पीएम और उनके द्वारा की गयी पहल के प्रति सम्मान तो जता रहे हैं लेकिन वह खुद वार्ता करने के लिये आगे आने से परहेज कर रहे हैं। क्योंकि किसान संगठन इस मुद्दे को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके हैं और चाह रखते हैं कि सरकार आंदोलन के सामने झुक कर खुद वार्ता के लिये आंमत्रित करे। वहीं किसान नेताओं पर दर्ज मुकदमे वापस लेने और गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग पहले ही उठाई जा चुकी है। ऐसे में यदि सरकार खुद वार्ता के लिये आमंत्रित करे तो यह किसान संगठनों के लिये जीत समान होगा वहीं किसान अपनी और मांगों को पूरा कराने में भी सफल हो सकते हैं।
वहीं किसानों के समर्थन में सड़कों पर उतरने वाले राजनीतिक दलों को भी यदि वोट बैेंक की चिंता नहीं है तो इस मामले में मध्यस्ता करने की पहल करनी चाहिये। उन्हें महापंचायत, धरना-प्रदर्शन करने की बजाये सर्द रातों में सड़कों पर बैठे किसानों और देशहित की चिंता करनी चाहिये। इस मुद्दे पर किसानों को न्याय मिले और सरकार की हार भी न हो यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिये आवश्यक है और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी। विपक्षी दल किसान और सरकार के बीच मध्यस्थ बनकर इस गंभीर मुद्दे को हल करने में सार्थक भूमिका निभा सकते हैं। यदि वह सच में ही किसान हितैषी हैं तो!

