जम्मू-कश्मीर: क्या हालातों का भी परीसीमन होगा?

आर्टिकल/इंटरव्यूजम्मू-कश्मीर: क्या हालातों का भी परीसीमन होगा?

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जम्मू-कश्मीर: क्या हालातों का भी परीसीमन होगा?

रंजीता सिन्हा
जम्मू-कश्मीर को लेकर आशा और आशंका दोनों ही पहलू एक दूसरे की परीक्षा ले रहे हैं। राजनीतिक हस्तियों से लेकर यहां के आम नागरिक जहां इस क्षेत्र में आगे कुछ नया और साकारात्मक होने की उम्मीद लिए आशान्वित हैं, तो वहीं इन्हीं में तमाम ऐसे हैं जो अचानक आशांति फैलने अथवा कुछ बड़ा नाकारात्मक होने को लेकर आशंकित भी हैं। यहां का शिक्षित युवा वर्ग इस क्षेत्र में शांति, विकास और अपने सुखद भविष्य को लेकर बेहद आशान्वित है। असल में अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 व 35-ए की समाप्ति और राज्य का दर्जा खत्म किए जाने के बाद से ही जम्मू-कश्मीर के भविष्य को ऊहापोह की स्थितियां रहीं। सभी की नजर मोदी सरकार के अगले कदम पर टिकीं थीं। इसी माहौल में पीएम नरेंद्र मोदी की जम्मू-कश्मीर मसले पर बुलाई गई हालिया सर्वदलीय बैठक एक बड़ी पहल रही जिससे यकायक फिर यहां राजनीतिक और सामाजिक हलके में हरारत आयी है।

असल में यहां के जन-नुमाइन्दों का एक साथ बैठना इस केंद्र शासित क्षेत्र की संविधानिक स्थिति तय करने और वहां पूरी राजनीतिक प्रक्रिया बहाल करने के लिहाज से काफी अहमियत रखती है। गौर कीजिए, जबसे अनुच्छेद 370 हटा, तभी से इस बात की आशंकाएं जताई जा रहीं हैं कि, कि आतंकी बड़े पैमाने पर विध्वंस मचाएंगे और पाकिस्तान इस मसले पर भारत के खिलाफ नए सिरे से दुनिया के दूसरे देशों की गोलबंदी करने का प्रयास करेगा। दोनों ही दृष्टि से हालात बिगाडऩे कोशिशें तो हो रहीं हैं, लेकिन इन कोशिशों की जड़ें लगता है अब लगातार खोखली पड़ती जा रही है। पाकिस्तान ही नहीं चीन को भी कई बार संयुक्त राष्ट्र में मुंह की खानी पड़ी। जहां तक, आतंकी वारदात का सवाल है, छुटपुट घटनाओं को अंजाम देकर दहशतगर्द अपनी खीज मिटाने को बेबस दिख रहे हैं। मोदी सरकार भी समझ चुकी है कि, यहां हालात को सामान्य बनाने की दिशा में चरणबद्ध तरीके से लगातार रियायतें दी जाती रहें तो बेहतर होगा। बीते अगस्त में मनोज सिन्हा को उप-राज्यपाल बनाए जाने के साथ ही स्पष्ट हो गया था कि केंद्र अब वहां के नागरिकों को राजनीतिक कमान सौंपने को लेकर गंभीर है। यह बात अलग है कि, महामारी ने सबकुछ जकड़ लिया और ऐसे में जम्मू-कश्मीर की तस्वीर अब तक साफ न हो सकी।

बहरहाल, इस दौरान नेशनल कॉन्फ्रें स और पीडीपी समेत तमाम पार्टियों को यह एहसास हो गया होगा कि अब व्यावहारिक सियासत के सहारे ही उन्हें आगे बढऩा होगा। जम्मू-कश्मीर के लोगों को तरक्की की मुख्यधारा में शामिल होने का उतना ही हक है, जितना देश के किसी अन्य प्रदेश के नागरिक का। नागरिकों को राजनीतिक गतिरोध का बंधक बनाना ठीक नहीं। केंद्र के लिए यह एक बड़ी चुनौती तो है कि वहां पूरी तरह से राजनीतिक प्रक्रिया जल्द से जल्द बहाल हो और लोग अपनी जिम्मेदार लोकप्रिय सरकार चुन सकें, पर इसके लिए क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को भी लोगों को भरोसे में लेकर अमन-चैन बरकरार रखना होगा।

सच पूछिये तो, यहां आतंकवाद से निपटना हमेशा से एक चुनौती रही है, पर मौजूदा सरकार ने उसे महज हथियार के बल पर दबाने का प्रयास किया। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले पांच सालों तक सुरक्षा बलों को लगातार घाटी में सशस्त्र संघर्ष का सामना करना पड़ता रहा। जबकि बार-बार अपीलें कीं जातीं रहीं कि सरकार वहां के नागरिकों से संवाद कायम करे, उनकी जरूरतों को समझे और उनकी समस्याओं का हल निकाले।

लोगों में सरकार के प्रति भरोसा बढ़ेगा, तो आतंकवाद को मिलने वाली पनाह पर लगाम लगेगी। याद कीजिए, पिछली यूपीए सरकार ने घाटी के लोगों, हुर्रियत के नेताओं और दूसरे संगठनों से बातचीत के लिए एक समूह गठित किया था, जिसमें मुख्य वार्ताकार नियुक्त किया गया था। उस समूह में सभी दलों और विभिन्न संगठनों-संस्थाओं के लोग थे। इस समूह की पहल के कुछ सकारात्मक नतीजे भी देखने को मिले थे। वैसी ही पहल की अपेक्षा वर्तमान सरकार से भी की जा रही थी। जिसे अब अंजाम मिल रहा है।

गौरतलब है कि, कश्मीर घाटी में 10 जिले हैं जिनमें से 4 जिले ऐसे हैं जहां अलगाववादी और आतंकवादी सक्रिय हैं। यह जिले हैं सोपियां, पुलवामा, कुलगांव और अनंतनाग इन चार जिलों को छोड़ दें तो पूरी घाटी और जम्मू आतंकवाद और अलगाववाद से मुक्त है, जबकि आम धारणा है कि पूरा जम्मू और कश्मीर आतंकी गतिविधियों से जकड़ा है। यहीं कारण रहा कि, 2002 के विधानसभा चुनाव में कश्मीर घाटी और जम्मू के बीच मतदाताओं की संख्या में सिर्फ दो लाख का फर्क था।

ऐसे में अहम सवाल उठने लाजिमी हैं। जम्मू और कश्मीर में परिसीमन हुआ तो राज्य के तीन अलग हिस्सों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की विधानसभा की सीटों में बदलाव के साथ जम्मू और कश्मीर की राजनीति में भी बदलाव हो जाएगा? क्या बैठक के बाद की हालातों का भी परिसीमन संभव होगा? यानि जन-अपेक्षाएं, विकास और कानून-व्यवस्था अपना-अपना स्थान यहां पा सकेंगे?

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