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अफसर से मंत्री का सफर, क्या कठिन है डगर!


अफसर से मंत्री का सफर, क्या कठिन है डगर!

सियासी गलियारों से गुजरने का शौक तो कितनो का रहता ही है और राजनैतिक हुक्मरानों के साथ रहते हुए अधिकारियों के मन में राजनीती में आने की इच्छा के बीज का उपजना भी आम ही है।  

उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में मंत्रियों, नेताओ और यहाँ तक की अधिकारियों का आना-जाना बहुत तेज़ है। आपने ऐसे बड़े अधिकारियो के नाम सुने होंगे जिन्होंने अपनी नौकरी छोड़ या रिटायरमेंट के बाद राजनीती में जाना ही सही समझा। आखिरकार, राजनीती का नशा ही ऐसा है! 

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इतिहास के पन्नो को यदि पलट के देखा जाये तो अनगिनत अफसरों ने भी सियासत में कदम रखा और कुछ तो सफल रहे लेकिन कुछ तो आधी गलियों से ही लौट चले। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के चुनाव में पुलिस अधिकारी असीम अरुण के भाजपा में आने के बड़े चर्चे है। जनाब ने राजनीती के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ डाली। 

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी विजय शंकर पांडेय को कौन भूल सकता है जिन्होंने नौकरशाही में भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे मुहीम चलाई थी जिसने ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टतम आइएएस अफसरों को झटके में निकल फेका था। अपने नौकरशाही के पेशे में तो पांडेय सफल रहे लेकिन राजनीति की राह में न चल सके। 

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पांडेय ने राजनीती में अपनी किस्मत आजमाई और 2019 के लोकसभा चुनाव में लोक गठबंधन पार्टी की तरफ से अपनी कर्मभूमि फैजाबाद, जो अब अयोध्या के नाम से जाना जाता है, से चुनाव लड़ा किन्तु मात्र 2056 वोट पर ही सिमट के रह गए।  

नौकरशाही और सियासत एक तरफ से तो दो रास्ते है लेकिन दूसरी तरफ दोनों ही रास्ते एक भी है। पांडेय और असीम अरुण अकेले ऐसे अधिकारी नहीं है जिन्होंने राजनीती में कदम रखा। राय सिंह का कांग्रेस के टिकट से लड़ना, आइएएस अधिकारी देवीदयाल कुशल का राजनीती में हाथ आजमाना और ऐसे अनगिनत नाम है जिन्होंने अधिकारी होने के साथ या रिटायरमेंट के बाद सियासत में कदम रखा किन्तु सफल न हो सके।  

लेकिन सीधे तौर पर यह कहना की राजनीती नौकरशाहियो के लिए नहीं है, यह गलत होगा। सियासी गलियों में कुछ ऐसे नाम भी है जिन्होंने अधिकारी होते हुए भी राजनीती में सफलता पाई। 

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सत्यपाल सिंह इन सफल नामो से से एक है जो मुंबई के पुलिस कमिश्नर रह चुके है और 2014 के लोकसभा चुनाव में बागपत में बड़ी जीत हासिल की। जनरल वीके सिंह ने भी भाजपा की तरफ से 2014 में गाजियाबाद सीट से जीत हासिल कर मंत्रिमंडल में अपनी जगह बनाई। अधिकारी पीएल पुनिया ने भी कांग्रेस का दामन थामा और राजनीती में नाम बनाने में सफल रहे।  

नौकरी के दौरान या बाद राजनीतिक गतिविधियों में रूचि और आकर्षण होना नौकरशाहो में आम हो चूका है जिसमे कुछ तो सियासी गलियों में अपना झंडा लहरा बैठते है वही कुछ गलियों में लड़खड़ा जाते है।  

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