नई दिल्ली। इस समय देश में मुफ्त की रेवड़ी बांटने पर बहस छिड़ी हुई है। चुनावी वादों के दौरान बांटी जाने वाली मुफ्त रेवड़ी के वादे का असर अब देश की जनता पर पड़ने लगा है। आम आदमी पार्टी द्वारा किए गए वादे और दिल्ली चुनाव जीत के बाद उस पर अमल इसका वर्तमान में उदाहरण है। अब इस पर देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट भी गंभीर हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त की रेवड़ी पर सवाल उठाए हैं। राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने को मुफ़्त में चीजें या सुविधाएं देने का वादा मतदाताओं से करती हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये किया जाना उचित है। राजनीतिक मामलों को समझने वालों की माने तो जब राजनैतिक दल वोट मांगने जाते हैं तो इस तरह की बातें कहते हैं। लेकिन इसमें एक फ़र्क है कि सामान्य रूप से कहना कि हम सबका ध्यान रखेंगे और स्पेसिफिक रूप से कहना कि 15 लाख आएंगे खाते में और हम सबको दे देंगे। इस तरह स्पेसिफिक वादे करना ग़लत है। ये कहना भी ग़लत कि हम जब आएंगे तो बिजली बिल में दो या तीन रुपये माफ़ करेंगे। या फिर बिलकुल ख़त्म कर देंगे।
ये प्रवृत्ति किसी एक दल की नहीं बल्कि देश के सभी दलों की आज बनी हुई है। लेकिन ये प्रवृत्ति रुकनी चाहिए। अगर दल कुछ करना चाहते हैं तो उसके लिए नियम कानून होने चाहिए कि उसे किस तरह होना चाहिए। इसकी जवाबदेही होनी चाहिए। एक ऐसा समाज जहां आर्थिक और सामाजिक सहित तमाम तरह की विषमताएं पाई जाती हैं। वहां सभी के लिए एक समान कदम नहीं उठाया जा सकता। ऐसे में वंचितों और शोषितों का कल्याण करना सरकार की प्राथमिकता है। लेकिन लोकतंत्र में अगर काम बहुसंख्यक समाज को लाभांवित नहीं करेगा तो दल चुनकर नहीं आ सकते। ऐसे में तो कहा जाएगा कि सरकार ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फ़ायदा पहुंचाएगी। यह यहां तक तो ठीक है। लेकिन अब ये होने लगा है कि जनता से वादे करो और भूल जाओ। ऐसे में पहले जो फुंसी थी उसने कैंसर का रूप ले लिया है। इस प्रवृत्ति का नतीजा ही ये है कि अब कहा जाने लगा कि फ्री बिजली देंगे। बताइए कि कोई सरकार फ्री बिजली कैसे दे सकती है। आख़िरकार पैसा जनता का है और फ्री बिजली क्यों मिलनी चाहिए। जो लोग बिजली ख़रीद सकते हैं, उन्हें फ्री में क्यों दी जाए।
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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी अब इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि अगर जनता को फ्री में सुविधाएं देंगी तो सरकारें कंगाल हो जाएंगी। देश के लिए एक आफ़त पैदा हो जाएगी। इन सभी फ्री सुविधाओं को बंद किया जाए। अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि मन में एक शक और पैदा होता है कि कहीं केंद्र सरकार के आर्थिक हालत बहुत ज़्यादा खराब तो नहीं हो गए है। ऐसा क्या हो गया कि अचानक से सारी चीजों को बंद करने और वापस लेने या इनका विरोध करने की स्थिति अब आ रही है।
केजरीवाल का आरोप है कि केंद्र सरकार ने जब करोड़पति उद्योगपतियों के कर्ज़ माफ़ किया उसके बाद से ऐसे हालात उत्पन्न हुए है। वहीं अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आपस में टकरातीं ये दो चुप्पियाँ पर केजरीवाल का कहना है कि 2014 में केंद्र सरकार का बीस लाख करोड़ का बजट था। आज केंद्र सरकार का बजट लगभग चालीस लाख करोड़ का है तो सारा पैसा कहां जा रहा है। केजरीवाल का कहना है कि अगर भाजपा की केंद्र सरकार अमीर अरबपति का दस लाख करोड़ रुपये के कर्जे़ माफ नहीं करते तो इन्हें खाने-.पीने की चीज़ों पर टैक्स लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
