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‘हरि-शीला’ से बने “Harsil” का दिलचस्प इतिहास, ब्रिटिश सिपाही ने दिलाई पहचान

Harsil

उत्तरकाशी- यूं तो समूचा उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य और बेहतरीन हिल स्टेशनों के लिए जाना जाता है इन्हीं हिल स्टेशनों में से एक हर्षिल लोगों के लिए हमेशा से पसंदीदा स्टेशन रहा है हरसिल ना केवल अपनी प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है अभी तो धार्मिक महत्व के लिए भी लोग इसे जानते हैं. आज हम आपको हर्षिल के उस रोमांचक इतिहास के बारे में बताते हैं. जिसकी शुरुआत ब्रिटिश सेना के भगोड़े सिपाही पैट्रिक विल्सन से होती है. माना जाता है कि विल्सन ने ही हर्षिल की खोज की थी.

ब्रिटिश सिपाही ने दिलाई हर्षिल को पहचान

आज के समय में अपने प्राकृतिक नजारों और सेब के उत्पादन के लिए दुनिया भर में मशहूर हर्षिल को ढूंढने का श्रेय ब्रिटिश सेना से भागे हुए सिपाही पैट्रिक विल्सन को जाता है. इतिहासकारों की मानें तो 1857 के संग्राम के बाद पैट्रिक विल्सन सेना छोड़कर फरार हो गए थे. सेना से बचते बचाते विल्सन हिमालय की पहाड़ियों की ओर चले गए और भागीरथी नदी के तट पर एक खूबसूरत गांव हरसिल पहुंच गए. विल्सन को यह गांव बहुत ही अच्छा लगा और वह यहां की एक पहाड़ी लड़की से शादी कर यहीं के हो गए. विल्सन ने लंदन की कई कंपनियों के साथ करार कर यहां से फर, कस्तूरी का निर्यात कर हर्षिल को नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई. स्थानीय लोग विल्सन को विल्सन पहाड़ी या राजा विल्सन कहा करते थे.

हरि-शीला से बना हर्षिल

हर्षिल का नाम कैसे पड़ा, इसको लेकर कई तरह दिलचस्प कथाएं प्रचलित है. कहा जाता है कि सतयुग में देवी भागीरथी और जालंधरी के बीच बहस हो गई. बहस इस बात पर हुई कि सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कौन है. दोनों की बहस होता देख भगवान विष्णु ने बीच-बचाव करने का मन बनाया. जिसके लिए उन्होंने पत्थर की एक शीला का रूप धारण कर लिया. कहा जाता है कि इस शिला ने दोनों ही देवियों के क्रोध को अपने अंदर सुख लिया. जिसके बाद दोनों का क्रोध शांत हो गया. कहा जाता है कि अपनी उग्रता के लिए जाने जाने वाली यह दोनों नदियां इस प्रकरण के बाद शांत रूप में बहने लगी. यही वजह है कि पहले इस जगह का नाम ‘हरि-शीला’ पड़ा,जिसे बाद में हर्षिल के नाम से जाना जाने लगा.

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