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भोपाल ने आयोजित हुआ IIA के इंटरैक्टिव सत्र “सर्कल” का एक और संस्करण

भोपाल। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट (आईआईए) के भोपाल सेंटर की ओर से शनिवार को मेट्रोपोलिटियन आर्किटेक्चर प्रोजेक्ट्स इन ग्लोबल साउथ विषय पर इंटरेक्टिव सेशन “सर्कल” का आयोजन किया गया। इसमें की-नोट स्पीकर इटली की डॉ. एंटोनेला कॉन्टिन थीं। वे मिलान में यूनिवर्सिटी ऑफ पॉलिटेक्निको डी मिलानो में आर्किटेक्चर और अर्बन स्टडीज विभाग (डीएएसटीयू), स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर अर्बन प्लानिंग कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग में रिसर्च एसोसिएट हैं। उन्होंने ‘भारतीय परिदृश्य को प्रभावित करने वाले प्राकृतिक खतरों को समझना जरूरी’ है विषय पर अपनी बात रखी।

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उन्होंने कहा कि पूर्वी देशों में डेजा कोटा रीजन होना चाहिए। ये इंडोनेशियन शब्द है इसमें डेजा का अर्थ गांव और कोटा का अर्थ शहर होता है। यानी हमें शहर को इस तरह से विकसित करना होंगे कि जहां आसपास के गांवों को भी विकास में बराबरी का भागीदार बनाया जाए। उन्होंने कहा कि आज शहर में आबादी बढ़ने के साथ खेत-तालाब गायब होते जा रहे हैं। ऐसे में शहर हर चीज को बाहर से ट्रांसपोर्ट पर निर्भर होते जा रहे हैं। इससे वस्तु की लागत भी बढ़ती है और प्रदूषण भी होता है। उन्होंने कहा कि डेजा कोटा गांव और शहर का एक ऐसा मिश्रण होता है, जहां खेत, तालाब, मॉल और मल्टीस्टोरी बिल्डिंग सभी होती है। 

सुविधा नहीं बढ़ेगी को खत्म होंगे गांव

उन्होंने कहा कि भोपाल जैसे शहरों में महानगरीय प्राधिकरण होना चाहिए। अभी शहर की आबादी बढ़ने पर आसपास के गांवों को शहर में मिला लिया जाता है, ये समस्या का हल नहीं हो सकते। लोग बचत के लिए शहर के आसपास के गांवों में रहते हैं, इससे इन गांवों पर क्षमता से अधिक बोझ बढ़ता है। इससे गांव का प्राकृतिक वातावरण भी तबाह होता है। यदि प्राधिकरण बनेंगे तो गांवों को बिना शहर में शामिल किए सुविधाओं का विस्तार होगा। अभी कई देश ऐसे हैं जहां गांव खत्म ही हो गए। वहां खेती के लिए भी दूसरे देशों के श्रमिकों पर निर्भर हैं या आयात पर। विकासशील देश भी तेजी से इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं।

छोटे मकान पर भी ग्रीन बिल्डिंग हो सकते हैं

इस मौके पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट के सचिव आशुतोष अग्रवाल ने कहा कि अभी हमारे देश में 70 प्रतिशत आबादी शहर में रहती है, लेकिन हम पढ़ाई से लेकर प्लानिंग तक शहरों के लिए करते हैं। हमारे देश में गांव के विकास की योजना पर बात नहीं होती। उन्होंने कहा कि लोगों को लगता है कि ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट कोई नया कॉन्सेप्ट नहीं है जबकि हमारे देश में कई सदियों से ऐसी इमारतें बनती रही हैं। पहले ऐसी बाउड़ी बनती थी जिसे पानी के लिए उपयोग किया जाता था। साथ ही दो से तीन मंजिला भवन में लोग रहते भी थे। ये प्राकृतिक रूप से ठंडे रहते थे।

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कार्यक्रम का आयोजन आर्किटेक्ट आशुतोष अग्रवाल, सचिव, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट्स, आर्किटेक्ट शुभाशीष बनर्जी, अध्यक्ष आईटीपीआई, एमपी चैप्टर और एआर के संयुक्त तत्वावधान में सफलतापूर्वक किया गया। इस अवसर पर आईआईए एमपी चैप्टर के अध्यक्ष जितेंद्र मेहता भी मौजूद थे। यह कार्यक्रम जैक्वार ग्रुप और एनसीआर द्वारा संयुक्त रूप से प्रायोजित किया गया था।

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