जब आपको किसी भी टूर्नामेंट में आगे जाने के लिए तीन में से दो मैच जीतने ज़रूरी होते हैं और पहला मैच आप हार चुके होते हैं तो आपकी टीम चाहे जितनी बड़ी हो दबाव में होती है और यही बात तब रिवर्स हो जाती है जब आप अपना पहला मैच जीत चुके होते हैं तो भले ही आपकी टीम थोड़ी कमज़ोर समझी जाती हो आपको एडवांटेज रहता है. एशिया कप में भारत और श्रीलंका के बीच आज शाम सुपर-4 के लिए खेले जाने वाले मैच में यही पोजीशन है. भारत पहला मैच हार चूका है मगर मज़बूत टीम मानी जाती है वहीँ उसके सामने उतरने वाली मेज़बान श्रीलंका ने अपना पहला मैच जीत लिया है लेकिन भारत के मुकाबले कमज़ोर टीम समझी जाती है. आप कह सकते हैं कि आज का मैच एडवांटेज बनाम डिसएडवांटेज वाला है. भारत हारा तो फ़ाइनल की उम्मीदें लगभग ख़त्म, वहीँ श्रीलंका हारा तो अगला मैच जीतकर फाइनल में पहुँचने की उम्मीद बरकरार।
वैसे भारत के पिछले रिकॉर्ड पर अगर नज़र डालें तो करो या मरो मैच में उसका प्रदर्शन शानदार रहता है. 2019 के बाद से भारत ने इस सिचुएशन वाले 11मैचों में से आठ मैच जीते हैं दो हारे हैं जबकि एक में नतीजा नहीं आया है। भारत के लिए यह मैच भी करो या मरो वाली स्थिति का ही है. उसे आगे जाने के लिए हर हाल में जीतना ही होगा। भारत बेशक मज़बूत टीम है लेकिन अगर एशिया के तीनों मैचों पर नज़र डाली जाय तो वो मज़बूती नज़र आती. पहले मैच में भी जिसे भारत को आसानी से जीतना चाहिए था पाकिस्तान ने अंतिम ओवर की चौथी गेंद तक पहुंचा दिया था, एक दो अच्छी गेंदें भारत से यह जीत छीन भी सकती थीं. दूसरा मैच जो हांगकांग के खिलाफ खेला गया उसे हम आसानी से ज़रूर जीते मगर उनके बल्लेबाज़ों ने हमारे गेंदबाज़ों की जमकर परीक्षा ली. हम हांगकांग से 40 रनों से जीते मगर पाकिस्तान 155 रनों से जीता, फर्क साफ़ दिखता है कि हमने हांगकांग जैसी टीम के खिलाफ भी वो परफॉरमेंस नहीं दी जो देनी चाहिए थी. सुपर 4 में पाकिस्तान के खिलाफ हार ही मिली लेकिन जिन्होंने मैच को देखा वह जानते हैं कि भारत की गलतियों का पाकिस्तान ने फायदा उठाया।
भुवनेश्वर और चहल जैसे अनुभवी गेंदबाज़ों ने उँगलियाँ उठाने वाली गेंदबाज़ी की. गेंदबाज़ी की बात करें तो चहल को रन रोकने के लिए नहीं बल्कि मिडिल ओवर्स में विकेट निकालने के लिए ही खिलाया जाता है मगर पिछले तीन मैचों में सिर्फ एक विकेट उनके खाते में जो उनकी गेंदबाज़ी की कहानी बयान कर रहा है. रोहित की कप्तानी और बल्लेबाज़ी दोनों ही इस टूर्नामेंट में ऑफ़ कलर दिख रही है. बेशक उनका रिकॉर्ड कप्तानी में बहुत अच्छा है मगर उनके बढ़ते प्रयोगों का टीम को फायदा नहीं बल्कि नुक्सान ही नज़र आ रहा है. जो खिलाडी टीम नहीं उसकी तो कोई बात ही नहीं लेकिन जो है उसका भी ढंग से प्रयोग नहीं किया जा रहा. एक तरफ फीयरलेस क्रिकेट की बात हो रही है वहीँ हुड्डा से गेंदबाज़ी करवाने से डर भी लग रहा है. कहीं न कहीं दिमाग़ दोराहे पर खड़ा मालूम पड़ता है, अनिर्णय की स्थिति वाला। यह बात टीम के लिए खतरनाक साबित होती है.
श्रीलंका के पास भले ही बड़े नाम न हों लेकिन पिछले तीन मैचों में छोटे नामों वाले श्रीलंकाई खिलाडियों छोटे छोटे प्रयासों से टीम को लगातार दो मैच जिताये , वह भी तब जब पहले मैच में उसे अफ़ग़ानिस्तान के हाथों दिल तोड़ने वाली हार मिली थी. रोहित को भी मालूम है कि श्रीलंका की टीम को हलके में नहीं लिया जा सकता। आज की रफ़्तार वाली क्रिकेट में श्रीलंका तो क्या किसी भी टीम को हलके में नहीं लिया जा सकता। अभी हाल ही में ज़िम्बाब्वे ने ऑस्ट्रेलिया को उसी घर में पटखनी देकर इसका सबूत भी दिया है, श्रीलंका का रुतबा फिलहाल तो ज़िम्बाब्वे से काफी ऊंचा है. इस मैच में भी टॉस अहम् भूमिका निभाएगा, दुबई हो या शारजाह टॉस जीतने का मतलब मैच जीतना माना जाता है. दुबई अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में 2021 के बाद से 18 मैचों में 16 बार वो टीमें जीती हैं जिन्होंने लक्ष्य का पीछा किया है. इन 18 मैचों में 17 बार कप्तान ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग करने का फैसला किया है.
बहरहाल एडवांटेज बनाम डिसएडवांटेज वाले इस मैच में टॉस जीतने का एडवांटेज बहुत काम करेगा लेकिन वो आपके हाथ में नहीं। जो आपके हाथ में है रोहित शर्मा को उसे एक्सीक्यूट करना होगा। जो गलतियां पिछले मैचों में की हैं उनसे बचना होगा। फीयरलेस क्रिकेट अच्छी बात है लेकिन उसकी भी कोई सीमा होती है, आप सीमा से निकलने की कोशिश करेंगे तो नुक्सान भी उठाना पड़ेगा। विराट कोहली की पाकिस्तान के खिलाफ पारी इसका ताज़ा सबूत है, वह भी फीयरलेस पारी थी लेकिन होश के साथ. जोश में होश खोना फीयरलेस नहीं होता। चलिए देखते हैं शाम को क्या होता है, उम्मीद हैं गलतियां सुधरेंगी और भारत फाइनल में पहुंचेगा। कल मिलेंगे मैच की समीक्षा लेकर।

