BJP Jat Politics: भाजपा के इतिहास में किसी जाट नेता को पहली बार बनाया प्रदेश अध्यक्ष, केंद्र से लेकर राज्य तक जाटों का दखल

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पांच राज्यों में जाटों की जनसंख्या अच्छी खासी है। 2024 के आम चुनाव में जाटों की वोट पाने के लिए भाजपा ने ऐसी शतरंजी चाल चली कि अब केंद्र में उपराष्ट्रपति के पद पर जाट बिरादरी के जगदीप धनखड़ बैठे हैं तो उप्र प्रदेश में भाजपा के प्रदेध अध्यक्ष के पद पर भूपेन्द्र सिंह चौधरी की ताजपोशी की गई है। यानी केंद्र से लेकर प्रदेश तक राजनीति में शीर्ष पदों पर जाटों का कब्जा है। वहीं भाजपा के इतिहास में पहली बार किसी जाट नेता की प्रदेश में पाटी प्रदेश अध्यक्ष पर ताजपोशी हुई है। प्रदेश में 1996 के चुनाव के दौरान जाटों का भाजपा के प्रति झुकाव हुआ तो पार्टी नेतृत्व ने इस बिरादरी के वोटों की ताकत को पहचाना। जाट जनसंख्या पश्चिमी उप्र ही नहीं देश के पांच राज्यों में किसी भी दल का तख्ता पलटने की ताकत रखती हैं। पांच राज्यों में राजस्थान,उप्र, हरियाणा,पंजाब और मप्र शामिल हैं। ये वो राज्य हैं जिनमें जाट वोटों की ताकत की अनदेखी करने की हिम्मत तो कोई दल भी नहीं कर सकता। यहीं कारण है कि आज भाजपा 2024 में आम चुनाव जीत के लिए नाराज चल रहे जाट मतदाता को चारों ओर से घेरने की रणनीति बनाई है। हालांकि भाजपा को इन निर्णयों का कितना लाभ 2024 में मिलता है यह चुनावी नतीजों के बाद पता चलेगा। लेकिन तय है कि देश का उपराष्ट्रपति पद जाट बिरादरी को देने से और उप्र भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर भूपेन्द्र सिंह चौधरी की ताजपोशी के परिणाम दूरगामी होंगे।  
उप्र के इतिहास में पहली बार हुआ है कि जब भाजपा ने किसी जाट को उत्तर प्रदेश भाजपा की जिम्मेदारी सौपी है। बता दें कि 2022 के विस चुनाव में भाजपा को जाटों के विरोध का सामना करना पड़ा। उससे पश्चिमी उप्र में पार्टी की दुर्गत हुई थी। हालांकि 2022 के चुनाव में भाजपा को प्रदेश में जनादेश तो मिला। लेकिन सत्तारूढ भाजपा को पश्चिमी उप्र के जाट बाहुल्य इलाकों में भारी पैमाने पर रालोद-सपा गठबंधन ने मात दी। भाजपा को डर है कि 2024 में कहीं ऐसी स्थिति दोहराई गई तो भारी नुकसान हो सकता है। इसलिए भाजपा ने भूपेन्द्र सिंह चौधरी को प्रदेश की कमान सौंपी।  

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों का भाजपा के प्रति लगाव 1990 के  से शुरू हुआ। राममंदिर आंदोलन के दौरान भाजपा ने जाट बिरादरी को हिंदू राष्ट्रवादिता का पाठ पढ़ाने की कोशिश की। उसके बाद दौर 1996 चुनाव का शुरू हुआ तो भाजपा ने जाट नेताओं केा आगे बढ़ाने का काम किया। ये वो दौर था जब डा0 रणवीर सिंह, नरेश बालियान को भाजपा ने राज्यसभा भेजा। इसके बाद 1998 के चुनाव में सोमपाल शास्त्री ने बागपत से चौधरी अजित सिंह के विरुद्ध उनकी परंपरागत सीट चुनाव जीता सोमपाल शास्त्री केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में कृषि राज्यमंत्री बने थे। लेकिन वह सरकार 13 महीने चली। जाट 1998 से 2019 के बीच राजनैतिक दलों से निराश हुए तो भाजपा की ओर आकर्षित हुआ। इसके बाद तो जाट अपने सर्वमान्य नेता चौधरी चरण सिंह के पंथनिरपेक्ष और जातिनिरपेक्ष किसान राजनैतिक सामाजिक मॉडल को भूलकर हिंदू राष्ट्रवादिता का सक्रिय समर्थक बन गए। अब जाट फिर से अपनी भूमिका में परिवर्तन करता दिख रहा है। आगामी चुनाव तक समीकरण क्या बनेंगे। क्या नतीजे होंगे यह भविष्य बतायेगा। लेकिन इसी हलचल से भाजपा डरी हुई है।

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