बसपा के गढ़ अंबेडकरनगर में बसपाईयों के ही भरोसे BJP-BSP को चुनौती दे रही सपा, कितनी आसान होगी राह

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बसपा के गढ़ अंबेडकरनगर में बसपाईयों के ही भरोसे BJP-BSP को चुनौती दे रही सपा, कितनी आसान होगी राह

लखनऊ। समाजवाद के पुरोधा माने जाने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया की जन्मस्थली अंबेडकरनगर (Ambedkarnagar) जिलें में इस बार भाजपा के लिए राह बेहद मुश्किल होती दिखाई दे रही है। कभी सपा और बसपा का गढ़ माने जाने वाले इस जिले की पांच में से दो विधानसभाओं में भाजपा ने 2017 में विजय पताका फहराईं जबकि बसपा ने तीन सीटों को अपने नाम किया था। लेकिन, इस बार परिस्थितियां उलट हैं। हालांकि, बसपा के सबसे मजबूत माने जाने वाले चेहरे भी इस बार पाला बदलकर सपा के साथ आ गये हैं, ऐसे में उसके लिए भी मुश्किलों का सामना करना तय है। सबसे मजबूत यहां पर एक बार फिर समाजवादी पार्टी दिखाई दे रही है, क्योंकि जिले के सबसे बड़े दिग्गज नेता इस बार साइकिल पर सवार होकर चुनावी मैदान में उतर चुके हैं। सितंबर 1995 में तत्कालीन फैजाबाद और आजमगढ़ से काटकर अंबेडकरनगर जिला बनाया गया। जिसमें कटेहरी, टांडा, अकबरपुर, आलापुर और जलालपुर विधानसभा आतीं हैं। इस जिले में सबसे ज्यादा धाक बहुजन समाज पार्टी (BSP) की रही है। मायावती भी पहली बार यहीं से चुनाव लड़ी थीं। हालांकि, 2012 में सपा ने बसपा के वर्चस्व को चुनौती देते हुए पांचों सीटों को अपने नाम किया था। हालांकि, पांच साल बाद यानी 2017 में सपा को सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा, वहीं 403 में से मात्र 19 सीट जीतने वाली बसपा के तीन विधायक रितेश पांडेय, राम अचल राजभर और लालजी वर्मा इसी जिले से चुनकर आये थे।

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कटेहरी (Katehri):
कटेहरी बसपा के सबसे मजबूत गढ़ में से एक माना जाता है। इस सीट पर 2017 में भाजपा की प्रचंड लहर के दौरान भी हार का मुंह देखना पड़ा था। तब इस सीट से कद्दावर नेता माने जाने वाले लालजी वर्मा ने भाजपा को मात दिया था। लालजी वर्मा अब सपा के साथ हैं। इस बार बसपा ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ पर भरोसा करते हुए प्रतीक पांडेय को अपना उम्मीदवार बनाया है। वहीं सपा ने बसपा के बागी विधायक लालजी वर्मा को चुनावी मैदान में उतारा है तो भाजपा गठबंधन में निषाद पार्टी के सिंबल पर अवधेश द्विवेदी को प्रत्याशी बनाया गया है। वहीं कांग्रेस ने निशात फातिमा पर दांव लगाया है। इस सीट के जातीय समीकरण को देखें तो सबसे ज्यादा दलित हैं, जिनकी आबादी 50 हजार से ज्यादा है। वहीं 44 हजार ब्राह्मण, 40 हजार कुर्मी, 20-20 हजार निषाद, यादव और ठाकुर हैं। इसके अलावा करीब 17 हजार राजभर हैं। इस सीट पर बसपा की चुनौती को भेदना आसान नहीं होगा, क्योंकि दलित और ब्राह्मण गठजोड़ यहां निर्णायक साबित हो सकते हैं। हालांकि, लालजी वर्मा के कद को देखते हुए मुश्किलें आसान हो सकतीं हैं। देखा जाये तो यहां कठिन त्रिकोणीय मुकाबला है।

टांडा (Tanda):
टांडा विधानसभा से लालजी वर्मा चार बार विधायक रहे हैं, उन्होंने 2012 में इस सीट को छोड़ दिया था। जिसके बाद से लगातार दो चुनाव में बसपा को यहां हार मिली है। 2012 में सपा और 2017 में भाजपा ने यहां से जीत दर्ज की है। जातीय आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा यहां करीब 01 लाख मुस्लिम मतदाता हैं तो वहीं दूसरे नंबर दलितों की आबादी है, जिनकी संख्या करीब 70 हजार है। कुर्मी 28 हजार, यादव 23 हजार, राजभर 18 हजार, निषाद 17 हजार और ब्राह्मण करीब 12 हजार हैं। बसपा ने सपा के बागी गौस असरफ की पत्नी असरफपुर किछौछा की नगर पंचायत अध्यक्ष शबाना खातून को उम्मीदवार बनाया है तो सपा ने पूर्व मंत्री राममूर्ति वर्मा को टिकट दिया है। जबकि, भाजपा ने सिटिंग विधायक संजू वर्मा का टिकट काटकर कपिलदेव वर्मा को प्रत्याशी बनाया है, वहीं कांग्रेस ने मेराजुद्दीन को कैडिडेट बनाया है।

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आलापुर (Aalapur):
इस सीट से 2002 में मायावती भी सदन जा चुकीं हैं। हालांकि, पिछले तीन चुनावों यानी 2007, 2012 और 2017 में इस सीट पर जिस पार्टी का विधायक जीता, उसकी सरकार बनी है। 2007 में बसपा के त्रिभुवन दत्त, 2012 में सपा के भीम प्रसाद और 2017 में भाजपा की अनीता यहां से विधायक बनीं। यहां पर दलितों की आबादी 87 हजार से ज्यादा है। वहीं कुर्मी 10 हजार, यादव 70 हजार, मुस्लिम 40 हजार, वैश्य 11 हजार, ब्राह्मण 25 हजार, निषाद 32 हजार और ठाकुर करीब 20 हजार हैं। बसपा ने यहां से केशरा देवी गौतम को उतारा है। वहीं सपा ने त्रिभुवन दत्त तो भाजपा ने सिटिंग विधायक अनीता कंवल की जगह त्रिवेणी राम को प्रत्याशी बनाया है। जबकि, कांग्रेस ने सत्यमवदा पासवन को टिकट दिया है।

जलालपुर (Jalalpur):
जलालपुर भी बसपा का ही गढ़ है। यहां से बसपा के रितेश पांडेय 2017 में विधायक चुने गये थे, हालांकि उनके 2019 में सांसद बनने के बाद इस सीट से सपा के सुभाष राय उपचुनाव में विधायक बने और बसपा को मात्र 790 मतों से हराया था। इस बार सुभाष राय सपा से पाला बदलकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं तो वहीं सपा ने बसपा सांसद रितेश पांडेय के पिता और पूर्व सांसद राकेश पांडेय को टिकट दिया है तो वहीं बसपा ने भाजपा के बागी राजेश सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है जो पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे थे। कांग्रेस ने रागिनी पाठक को उतारा है। जातीय समीकरणों की बात करें तो यहां पर सबसे ज्यादा 98 हजार दलित हैं। वहीं मुस्लिम 58 हजार, 55 हजार यादव, 29 हजार ब्राह्मण और 16 हजार कुर्मी हैं।

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अकबरपुर (Akbarpur):
अकबरपुर अंबेडकरनगर की सबसे हॉट सीट है। यहां पर सपा ने बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व कैबिनेट मंत्री रामअचल राजभर को चुनावी मैदान में उतारा है। वह यहां से सिटिंग विधायक हैं। बसपा ने भाजपा से आये चंद्रप्रकाश वर्मा पर दांव लगाया है। भाजपा ने पूर्व मंत्री धर्मराज निषाद को चुनावी मैदान में उतारा है तो कांग्रेस ने प्रियंका जायसवाल को सिंबल दिया है। इस सीट पर जातीय आंकड़ों पर नजर डालें तो दलित करीब 70 हजार, राजभर 50 हजार, कर्मी 43 हजार, मुस्लिम 30 हजार, यादव 25 हजार, ब्राह्मण 30 हजार, ठाकुर 18 हजार, निषाद 17 हजार हैं। इस सीट पर रामअचल राजभर की साख दांव पर है, क्योंकि, यहां से वो लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं।

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