अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि मुझे अपने संबंधियों, गुरुओं और मित्रों को मारकर राज्य प्राप्ति का सुख भोगना चाहिए, क्या ऐसा करने से मुझे आत्मसंतुष्टि मिल सकेगी। बेहतर होगा कि मैं जंगल में चला जाऊं और बिना किसी को नुकसान पहुंचाए एक तपस्वी का जीवन व्यतीत करूं। यहाँ वही ग़लतफ़हमी है जो लोगों में अध्यात्मवादियों के बारे में है। इस प्रकार की भ्रांति के कारण लोगों का मानना है कि अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाला कभी महत्वाकांक्षी नहीं हो सकता।
भगवान श्रीकृष्ण इस भ्रम को दूर करते हैं और अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं। अभिप्राय यह है कि यदि अर्जुन ने हथियार डाल दिए होते तो विश्व के सीमित संसाधन हमेशा के लिए कौरवों के हाथ में रह जाते और कौरव उनका दुरुपयोग अपनी प्रजा के शोषण के लिए करते। अर्थात जब चरित्रहीन लोग संसाधनों के स्वामी बन जाते हैं तो समाज में अनाचार एवं अराजकता फैलने की संभावना प्रबल हो जाती है। इसके विपरीत चरित्रवान एवं सदाचारी व्यक्ति अपने विवेक एवं बुद्धि का प्रयोग कर सामाजिक समरसता एवं सेवा से अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करता है।
कठोपनिषद में कहा गया है कि जब सच्चिदानंद स्वरूप सद्गुरु और समर्पित शिष्य के बीच समन्वय होता है तो अतुलनीय ज्ञान का उदय होता है। गीता में ज्ञान प्राप्ति से संबंधित एक श्लोक में योगेश्वर कहते हैं कि ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेंद्रिय’ अर्थात ऐसे शिष्य को ही ज्ञान मिलेगा जो समर्पित, तत्पर और संयमी होगा। कबीरदास जी ने सदियों पहले कहा था – गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए। गुरु एक ऐसा प्रकाशपुंज है जो कभी अपने लिए मार्गदर्शक नहीं बनता, बल्कि उसकी रोशनी अपने शिष्यों की मंजिल को आसान बना देती है। आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए सद्गुरु का मार्गदर्शन बहुत महत्वपूर्ण है।
गुरु एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है जो ज्ञान के साथ-साथ प्रेरणा का प्रकाश भी देता है, जो रास्ता भी दिखाता है और मंजिल तक भी पहुंचाता है। गुरु पवित्रता की धारा है, गुरु सदाचार का पोषक है। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है कि गुरु ही हैं जो रचनात्मक गतिविधियों और अपने ज्ञान के माध्यम से हमारे भीतर आनंद पैदा करते हैं। इस आनन्द की अनुभूति में ग्रहण किये गये विषय को शिष्य जीवनपर्यन्त नहीं भूलता। विश्व विजेता अलेक्जेंडर का कथन- मैं अच्छे जीवन के लिए अपने पिता का ऋणी हूँ लेकिन अच्छे जीवन जीने में सक्षम होने के लिए अपने शिक्षक का।
वायुपुराण में गुरु को बहुत सुंदर शब्दों में परिभाषित किया गया है। जो हमें ज्ञान देता है, हमें संसार में रहना सिखाता है, सामाजिक बाधाओं को आसानी से पार करने की कला सिखाता है। कठिन से कठिन बात को भी आसान तरीके से समझाओ और समझाने का तरीका ऐसा हो कि दिल तक पहुंचे, वही सच्चा गुरु है, वही आचार्य है। इसलिए गुरु के सानिध्य में जाने से जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल जाती है। सच्चिदानंद स्वरूप गुरु को लोगों का हृदय परिवर्तन करने के लिए ज्यादा उपदेश नहीं देने पड़ते, उनकी उपस्थिति मात्र से व्यक्तित्व बदल जाता है। उनकी थोड़ी सी प्रेरणा हृदय परिवर्तन करने में सक्षम है।
वैशाली की नगरवधू आम्रपाली और मगध साम्राज्य में आतंक का पर्याय बन चुके अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन करने के लिए गौतम बुद्ध को अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी। क्योंकि दोनों को उपदेशात्मक उपदेशों पर अधिक खर्च नहीं करना पड़ा। चाहे आध्यात्मिक मार्ग हो या सांसारिक जीवन, सद्गुरु की कृपा से प्रगति निश्चित है।

