AAP से दिल्ली न बची तो बहुत कुछ छिन जायेगा

आर्टिकल/इंटरव्यूAAP से दिल्ली न बची तो बहुत कुछ छिन जायेगा

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अमित बिश्नोई
अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी की किस्मत का फैसला 8 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों के साथ होगा। हालाँकि दिल्ली विधानसभा के नतीजे सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं हैं, इसका दायरा इसी साल के अंत में होने वाले बिहार चुनाव और उससे आगे जाते हुए 2026 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव तक बढ़ने वाला है, जहाँ ममता की बादशाहत को ख़त्म करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा एक और कोशिश करेंगे। दिल्ली की तरह पश्चिम बंगाल भी लिए सबसे बड़ी कमज़ोरी है. दोनों ही राज्यों में सारे घोड़े खोलने के बावजूद भाजपा को हर बार यहाँ मुंह की खानी पड़ती है. जहाँ तक दिल्ली की बात है तो 2014 से राजधानी की सभी सातों लोकसभा सीटें जीतने के बावजूद 26 साल से भाजपा सत्ता से बाहर है।

दिल्ली के चुनाव नतीजों का डोमिनोज़ प्रभाव ही इसे भारत का राजनीतिक आकर्षण बनाता है। बिहार और पश्चिम बंगाल के अलावा, 2026 में असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिनकी जनता दल (यूनाइटेड) केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार की प्रमुख बैसाखियों में से एक है, अब तक एक आज्ञाकारी सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। कुमार के समर्थक इस बात पर जोर देते हैं कि उनके पास सभी इक्के हैं, और राज्य में नेतृत्व के खेल में उन्हें दरकिनार करने का कोई भी प्रयास उल्टा पड़ सकता है। संदेश यह है कि नितीश कुमार कुमार एकनाथ शिंदे नहीं हैं, इसलिए नितीश कुमार कब अवज्ञाकारी सहयोगी बन जांय कहा नहीं जा सकता।

दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की जीत बिहार में उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सहयोगियों को न केवल रक्षात्मक बनाएगी बल्कि सौदेबाजी के खेल में भी उनके दबदबे को कम करेगी। खासकर इसलिए क्योंकि हरियाणा और महाराष्ट्र जीतने के बाद यह भाजपा की जीत की हैट्रिक होगी। हालांकि फिलहाल जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा, जिसके पास वर्तमान में चार विधायक हैं, आवंटन में 40 सीटों का मुतालबा कर रही है. इसलिए बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि राष्ट्रीय राजधानी में राजनीतिक हवा किस तरह बह रही है, जहां केजरीवाल पूरी ताकत से लड़ रहे हैं. लौटते हैं दिल्ली की ओर, तो इस बार अब तक के चुनावी अभियान को देखा जाय तो न तो केजरीवाल की कोई लहर दिखाई दे रही है और न ही भाजपा के पक्ष में कोई अनुकूल हवा है। पिछले चुनावों की तुलना में आप के पक्ष में चर्चा कम ज़रूर हुई है. याद रखें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक अपना दिल्ली अभियान शुरू नहीं किया है। बात की जा रही है कि चुनाव प्रचार के अंतिम सप्ताह में वो चौके छक्के मारने आएंगे। हालाँकि कांग्रेस पार्टी की दिल्ली में कोई बात नहीं कर रहा है, या फिर ऐसा भी कह सकते हैं कि आम आदमी पार्टी एक तरह से हवा बना रही है कि कांग्रेस को वोट देने का मतलब भाजपा की मदद करना है क्योंकि कांग्रेस पार्टी इस बार भी अपना खाता नहीं खोल पाएगी। बीमारी की वजह से चुनाव प्रचार से पिछले दिनों दूर रहे राहुल की रैलियों के रद्द होने से भी लोगों में यह सन्देश गया कि कांग्रेस ने एक तरह से सरेंडर कर दिया है, हालाँकि कांग्रेस के अंदरखाने से निकली बात पर भरोसा किया जाय तो राहुल गाँधी भी दिल्ली चुनाव के प्रचार में अब तभी उतरेंगे जब प्रधानमंत्री मोदी मैदान में आएंगे।

एक और पहलू भी है। केजरीवाल एक महत्वाकांक्षी नेता हैं जो प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं, उन्होंने 2014 में मोदी के खिलाफ वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर अपनी इस महत्वाकांक्षा को ज़ाहिर भी किया, था, हालाँकि बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी थी.नितीश कुमार और ममता बनर्जी भी यही सपना पाले हुए हैं, लेकिन यह महसूस करने के बाद कि वे कांग्रेस या भाजपा के समर्थन के बिना प्रधानमंत्री नहीं बन सकते वे सावधानी से कदम बढ़ा रहे हैं। केजरीवाल की पार्टी एक साथ दो राष्ट्रीय पार्टियों से लड़ रही है और इस तरह, न केवल दिल्ली में बल्कि पंजाब में भी दोनों पार्टियों का साझा निशाना बन गई है।

केजरीवाल को धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के मामले में अपने रुख पर अस्पष्ट होने के कारण विपक्षी गठबंधन में विश्वसनीयता की समस्या का भी सामना करना पड़ रहा है। भले ही वह दिल्ली जीत जाए और खुद को मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित कर ले, लेकिन उसे बनर्जी या समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव या राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव का समर्थन मिलने की संभावना नहीं है। केजरीवाल को एक ऐसे ग्राहक के रूप में देखा जाता है जो कभी भी फिसलकर किसी और दुकान में जा सकता है. हालांकि आम आदमी पार्टी दिल्ली के अलावा पंजाब में सत्ता में है, संयोग से दोनों ही प्रदेशों में उसने सत्ता कांग्रेस पार्टी से हथियाई है. ऐसे में इन दोनों प्रदेशों में कांग्रेस के निशाने पर भाजपा से ज़्यादा आम आदमी पार्टी है. दिल्ली में सत्ता खोना पार्टी और केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए घातक साबित हो सकता है। दिल्ली में सत्ता खोने का मतलब पंजाब भी सुरक्षित नहीं, इसके अलावा अन्य राज्यों में AAP ने जो एक्सपेंशन प्लान बना रखे हैं, विशेषकर गुजरात के लिए, वह भी खटाई में पड़ जायेगा। कांग्रेस की शीला दीक्षित ने 15 वर्षों तक दिल्ली में शासन किया, बहुत काम किये, उनके कामों को आज भी लोग याद करते हैं लेकिन 2013 में अन्ना हज़ारे और भाजपा की मदद से अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों ने भ्रष्टाचार का जो नैरेटिव गढ़ा, उसने कांग्रेस से सत्ता छीन ली, हालाँकि शीला के खिलाफ केजरीवाल कुछ भी साबित नहीं कर पाए. अब समय ने करवट बदली है. केजरीवाल भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके हैं, CAG की एक दर्जन रिपोर्ट उनके खिलाफ हैं, इन रिपोर्ट्स में भ्रष्टाचार की बातें हैं, 2013 में भी CAG की रिपोर्टों को ही केजरीवाल ने हथियार बनाया था, अब वही हथियार उनके खिलाफ भी इस्तेमाल हो रहा है. कहा जा रहा है दिल्ली में कांग्रेस पार्टी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है लेकिन देखा जाय तो वास्तव में वजूद की लड़ाई आम आदमी पार्टी के लिए है, उनसे दिल्ली न बची तो बहुत कुछ छिन जायेगा।

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