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Special Story: राजनीति में अप्रासंगिक होती विचारधारा की बातें

कांग्रेस पार्टी और भाजपा में तो विचारधारा की लड़ाई है तो ज़ाहिर है कांग्रेसियों और भाजपाइयों में भी इसी की लड़ाई रहती होगी, इसके बावजूद ऐसा क्यों होता है कि कांग्रेस पार्टी से खफा होने वाला, निकलने वाला या निकाले जाने वाला (हालाँकि कांग्रेस पार्टी जल्दी किसी को निकलती नहीं है) भाजपा की ओर ही क्यों रुख करता है, उसे सेक्युलर ढाँचे वाली दूसरी पार्टी क्यों दिखाई नहीं देती। तो क्या राजनीती में विचारधारा का कोई महत्व नहीं है क्या यह सब बातें खोखली हैं या फिर बढ़ती अवसरवादिता ने विचारधारा की बातों को अप्रासंगिक कर दिया है. 

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कल गुजरात में कांग्रेस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे हार्दिक ने कांग्रेस का नात तोड़ा, हालाँकि अभी वह भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं लेकिन कहा जा रहा है कि जल्द ही हो जायेंगे, वहीँ आज पीढ़ियों से कांग्रेसी रहे जाखड़ फैमिली के नए मुखिया सुनील जाखड़ ने 50 बरस से संभाल रहे कांग्रेसी विचारधारा का बोझ उतार फेंक आज भगवा पटका धारण कर लिया। अब वह आगे का जीवन दक्षिणपंथी विचारधारा के साथ गुज़ारेंगे। एक लम्बी फेहरिस्त है ऐसे कांग्रेसी नेताओं की जिनकी कई पीढ़ियों कांग्रेसी विचारधारा पर चलती रहीं पर नई पीढ़ी ने उगते सूरज के साथ रहने का फैसला किया। 

हार्दिक पटेल का 2020 का एक ट्वीट वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने लिखा था कि विचारधारा के अनुयायी हार के डर से पाला नहीं बदलते क्योंकि ऐसा तो सिर्फ व्यापारी ही करते हैं. उस ट्वीट में आगे वह कहते हैं कि मरते दम तक वह कांग्रेसी ही रहेंगे। इस ट्वीट को अभी दो ढाई साल ही हुए हैं और विचारधारा की कसमें खाने वाले हार्दिक का कांग्रेस की विचारधारा से विश्वास उठा गया.

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वैसे हार्दिक के पास अपनी विचारधारा को बचाने का मौका है, अगर वह भाजपा की जगह AAP  के साथ जाते हैं तो विचारधारा पर कायम रह सकते हैं हालाँकि कांग्रेस और AAP की सोच में भी काफी फ़र्क़ है पर बुनियादी सोच एक ही है लेकिन हार्दिक के पत्र को पढ़कर तो वही लगता है कि जल्द ही आधिकारिक रूप से दक्षिणपंथी होने जा रहे हैं.

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