अमित बिश्नोई
देश में जाहिलों का झुण्ड इन दिनों सड़कों पर तांडव कर रहा है, कोई पत्थर बरसा रहा है तो कोई तलवारें लहरा रहा है और इन घटनाओं को देश का रहनुमा चुपचाप देख रहा है, खामोश है, अच्छे और उचित समय का इंतज़ार कर रहा है, उसे कब बोलना है अच्छी तरह जानता है, ऐसे मौकों पर वो अक्सर खामोश हो जाता है, क्योंकि यह सब उसकी राजनीति को सूट करता है. वह तभी बोलेगा जब राजनीतिक रूप से शुभ मुहूर्त उसे इसकी इजाज़त देगा। लेकिन बात हम आज उन जुम्मनों की करेंगे जो सड़को पर इन दिनों अपनी जिहालत का सबूत दे रहे हैं , अपने मज़हब और अपने समुदाय को बदनाम कर रहे हैं, अपने उस नबी की शिक्षाओं की बेहुरमती कर रहे हैं जिसे वह सबसे ज़्यादा चाहने का दावा करते हैं और जिनके लिए वह आजकल हाथों में पत्थर लिए नज़र आते हैं।
इन्हें हम क्या कहें, जाहिल या खिलौना? खिलौना ही तो हैं ये लोग, इनको ज़ाहिल ही तो कहा जाएगा। यह उन चंद कट्टरपंथी तथाकथित लोगों के हाथों की कठपुतली हैं जिन्हें बड़ी आसानी से नचाया जा सकता है जिन्हे सिर्फ इतना कहकर कि इस्लाम खतरे में है, नबी का अपमान, इबादतगाहों को खतरा है, हाथों में पत्थर थमाकर सड़कों पर खुला छोड़ दिया जाता है और इनको जिहाद के नाम पर सड़कों पर मरने मारने के लिए उकसाने वाले कहीं कोने में छिपे रहते हैं, यह कभी सामने नहीं आते, इनके या इनके बच्चों के हाथों में कभी पत्थर नज़र नहीं आते. इसके लिए उनके पास जुम्मनों की कमी नहीं। शहर की तंग बस्तियों में यह बड़ी आसानी से मिल जाते हैं, इनमें से कोई ठेला लगाता है, कोई फेरी लगाता है, कोई सब्ज़ी बेचता है तो कोई जानवरों को हलाल करता है।
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धार्मिक तौर पर यह सब कट्टर की कैटेगरी में आते हैं। इन्हें इनके धर्म के बारे में जितनी जानकारी दी जाती है यह बस उतना जानते हैं और पक्का विश्वाश रखते हैं, यह कभी भी यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इनको जो व्यक्ति जानकारी दे रहा है वो कितना विश्वसनीय है और कितनी सही जानकारी दे रहा है। इन लोगों को बताया जाता है कि धर्म के बारे में बहस करना या तर्क ढूंढना गुनाह होता है और ये सारे जुम्मन उस गुनाह से बचने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। ये मुस्लिम पर्सनल बोर्ड की, जमीअत उलमा की या मजलिसे मुशावरत की अम्न की अपीलों की भी नहीं सुनते। इन जुम्मनों को लगता है कि यह लोग जिहाद कर रहे हैं। इन्हें जिहाद की ABCD भी नहीं मालूम होती है, इन्हें नहीं मालूम कि जिहाद कब और क्यों होता है. इन्हें तो बस इतना समझाया जाता है कि सामने वाले ने तुम्हारे मज़हब को गाली दी, तुम्हारे पैग़म्बर का अपमान किया, तुम्हें बदला लेना है और जुम्मनों में जिहाद का शौक़ जाग जाता है।
फिर इन्हें इसकी फ़िक्र नहीं होती कि इनके बाद इनके परिवारों का क्या होगा, इनके बच्चों की परवरिश कैसे होगी, इन्हें समझा दिया जाता है कि अल्लाह ने पैदा किया है वही इनकी परवरिश करेगा। इन्हें यह नहीं बताया जाता कि अल्लाह ने तुम्हें सोचने समझने की शक्ति भी दी है, शरीर के सबसे ऊपरी हिस्से में दिमाग़ दिया है जो आपको कुछ भी करने से पहले यह बताता है कि क्या सही है या क्या गलत। इन जुम्मनों को वरगलाने के लिए इनके आका सबसे पहले इनके दिमाग़ पर ही कब्ज़ा करते हैं, इनकी सोचने समझने की क्षमताओं को प्रभावित करते हैं ताकि ये जुम्मन आसानी से उनके मंसूबों को पूरा करने के लिए एक हथियार बन सकें।
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यह सही है कि देश में इस समय साम्प्रदायिक तौर पर हालात काफी अस्थिर हैं, दक्षिणपंथी अपने चरम पर है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाय। भारत जैसे सांस्कृतिक और सामुदायिक विविधता वाले देश में ऐसे विवाद नए नहीं हैं। आज़ादी से पहले भी थे और आज़ादी के बाद भी और यह भी तय है कि आगे भी जारी रहेंगे क्योंकि हिन्दू हो या मुसलमान धैर्य और संयम की कमी सबमें होती जा रही है, कानून को हाथ में लेना, खुद ही अदालत और खुद ही जज बन जाना अब एक आम बात हो गयी है. इसे रोका जाना, इसपर लगाम लगाना बहुत ज़रूरी हो गया है, कहीं ऐसा न हो कि बात हाथ से निकल जाय और उसका खमियाज़ा हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़े।

