चलिए हम आपको हिमालय की इस खास चोटी की खासियत के बारे में बताते हैं।
भले ही हमें कंचनजंगा एक नाम लगता हो, लेकिन ये चार शब्दों से मिलकर बना है। इसमें कांग यानी बर्फ, चेन यानी बड़ा, इजो यानी खजाना अंगा यानी पांच। ये तिब्बतियन शब्द है और इसका मतलब होता है कि बर्फ में दबे पांच खजाने।
जो ब्राउन और जॉर्ज बैंड। ये दोनों ऐसे शख्स थे जिन्होंने 25 मई 1955 को कंचनजंगा पर चढ़ाई की थी। इन दोनों ने स्थानीय निवासियों से ये वादा किया था कि वो पर्वत की चोटी पर नहीं चढ़ेंगे। माना जाता है कि कंचनजंगा की चोटी पर भगवानों का निवास होता है। इसलिए कोई भी वहां तक नहीं जाता है।
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कहा जाता है कि आजतक कोई भी पर्वतारोही इसकी चोटी पर खड़ा नहीं हो पाया है। हालांकि, 200 पर्वतरोहियों ने इसके काफी पास जाने की कोशिश की, जिसमें से कुछ लोग इसी कोशिश में मारे गए। इसलिए कोई भी कंचनजंगा चोटी से कुछ फिट दूर ही रूक जाता है।
तुलशुक लिंग्पा नाम का एक तिब्बतियन भिक्षु अपने 12 साथियों के साथ एक नए रास्ते की खोज पर इस चोटी पर निकला था। वो जोर-जोर से मंत्र पढ़ता हुआ जा रहा है। लोग मानते हैं कि इसके बाद वो कहीं गायब हो गया।
कहा ये भी जाता है कि कंचनजंगा पर आज तक जिन लोगों की भी मौत हुई, उनके शव आज तक नहीं मिले। साल 1992 में एक पोलिश पर्वतारोही वांड ने कंचनजंगा पर जाने की कोशिश की। वो हिमालय की सभी 14 चोटियों पर चढ़ाई करने वाली पहली महिला बनना चाहती थी, लेकिन वो अचानक गायब हो गई और उसका शरीर आज तक नही मिला।

