Zeba Hasn
फस्ल-ए-बाहार आई है होली के रूप में
सोला-सिंगार लाई है होली के रूप में
राहें पटी हुई हैं अबीर-ओ गुलाल से
हक की सवारी आई है होली के रूप में
लखनऊ चौक की सर्राफा गली (chowk sarafa gali) से गुरुवार को जो भी गुजरा उसे गुलाबी रंग में रंग दिया गया। फिर वह चाहे आने वाला खरीदार था या फिर दुकानदार। हर कोई आज गुलाबी रंग में रंगा हुआ नजर आ रहा था। खास बात यह थी कि रंग से ना ही किसी को परहेज था और ना कोई शिकायत। ऐसा हो भी क्यों ना सौ साल पुरानी चौक की इस परम्परा से सभी वाकिफ हैं। होली से एक दिन पहले चौक की सर्राफा वाली गली में रंग खेलने की गंगा जमुनी रिवायत आज भी बदस्तूर निभाई जाती है।
पांच से छह दुकानदारों ने की थी शुरुआत
चौक सर्राफा (chowk sarafa) के प्रमुख व्यापारी विनोद महेश्वरी ने बताया कि चौक की इस गंगा जमुनी तहजीब को बरकरार रखने वाली होली की शरुआत यहां के पांच छह दुकानदारों ने मिलकर करीब सौ साल पहले की थी। जब हम छोटे थे तब हमारे दादा और इस होली के बारे में बताया करते थे। फिर धीरे धीरे इस होली से लोग जुड़ते गए और आज तो सर्राफा मार्केट के सभी दुकानदार मिलकर इस परम्परा का निर्वाह करते हैं। इसमें हिंदु मुस्लिम सभी शामिल हैं। चिकन व्यवसाई भी शामिल होते हैं।
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औरतों और बच्चों के लिए छूट
इस गली में दोपहर दो बजे से शाम चार बजे तक लोग रंग की थालियां और गुलाबी रंग लेकर खड़े होते हैं। परम्परा के अनुसार इन दो घंटों में इस गली से जो भी गुजरता है उसे गुलाबी रंग से रंग दिया जाता है। फिर वह चाहे किसी भी मजहब का हो। हां यहां पर इस बात का जरूर ख्याल रखा जाता है कि महिलाओं और छोटे बच्चों के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं की जाती। अगर वह खुशी से रंग लगवाना चाहती हैं तो उन्हें रंग लगाया जाता है वरना नहीं। रंग के साथ ठंडाई और इमरती खिलाकर लोगों का मूंह मीठा किया जाता है।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल है ‘चौक’ की होली
‘शहर-ए-अदब’ लखनऊ को गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीता उदाहरण माना जाता है और इसे ऐसे ही यह नहीं कहा जाता है। इसके पीछे कई कारण हैं। मशहूर इतिहासकार योगेश प्रवीन ने अपनी किताब ‘लखनऊ नामा’ में होली का ज़िक्र करते हुए बताया है कि “यहां पर अग़र ईद आती है, तो सेवइयां खाने हिन्दू, मुस्लिमों के घर जाते हैं। और जब होली आती है, तो मुस्लिम समुदाय के लोग भी अपने घरों की बालकनी पर खड़े होकर, जुलूस निकाल रहे लोगों पर इत्र व रंगों की वर्षा करते हैं। जिससे न सिर्फ़ आपस में सौहार्दपूर्ण माहौल स्थापित होता है। बल्कि, एक-दूसरे के बीच प्यार व मोहब्बत भी झलकती है।” सीधे शब्दों में कहें, तो पिछले 100 वर्षों से चौक में ऐसा ही होता आ रहा है। जहां हिन्दू-मुस्लिम समाज के लोग एक साथ हंसी-ख़ुशी, मिल-जुलकर रहते हैं।
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रंग के बाद होता है सांस्कृतिक आयोजन
सर्राफा व्यापारी विनोद माहेश्वरी बताते हैं कि “इस बार की होली बहुत ख़ास है। हम लोग होली के साथ भाजपा की जीत का भी जश्न मना रहे हैं। एक दिन पहले रंग खेलने की परम्परा को पूरा करने के बाद शाम को चौक चौराहे पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। सौ साल पुरानी परंपरा को निभा करते हुए चौक के प्रमुख व्यापारी विनोद महेश्वरी राजकुमार वर्मा आदिश जैन अतुल गुप्ता दीपू खत्री पंकज अग्रवाल देवेंद्र वर्मा शालू टंडन रामजी रस्तोगी सुजीत आदि लोग मौजूद थे।

