गुजरात: वर्ष 1947 में जब देश आजाद हुआ तो कई राजाओं की रियायतों से मिलकर भारत वर्ष का गठन हुआ। वही गुजरात एक ऐसा राज्य था जो की आजादी के वक्त से चर्चा का विषय रहा इसे महात्मा गांधी और सरदार पटेल की कर्मभूमि के नाम से जाना जाता था और इस राज्य ने आजादी के लिए कड़ा संघर्ष किया। गुजरात शुरुआत से ही राजनीति का हिस्सा रहा है वर्ष 1947 में जब देश आजाद हुआ तो भारत के राजनेताओं ने राजनीति में कदम यही से रखा वही आजादी से पूर्व गुजरात अंग्रेज़ों की हुकूमत वाले बंबई प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। वर्ष 1997 में गुजरात को बम्बई राज्य में शामिल किया गया और भारत मे राज्यो को भाषा के आधार पर विभक्त करने के मामले ने तूल पकड़ ली। इस मांग के बाद भारत मे श्याम कृष्ण धर आयोग का गठन किया गया इस आयोग ने राज्यो का गठन भाषा के आधार पर करना गलत बताया और कहा अगर ऐसा होता है तो भारत कई छोटे छोटे खेमो में विभक्त हो जाएगा।
जाने कब गठित हुआ गुजरात
लेकिन भाषाई आधार पर राज्यो के बटवारे की मांग ने तूल पकड़ी और भारत मे जेबीपी आयोग का गठन किया गया। जिसने भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का सुझाव दिया। इस आयोग के गठन और सुझाव के बाद भारत मे गुजरात का गठन हुआ। वर्ष 1953 में राज्य पुर्नगठन आयोग का निर्माण हुआ 14 राज्य और 9 केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए। इसके बाद गुजरात क्षेत्र में महागुजरात आंदोलन उठ खड़ा हुआ। जिसके बाद 1960 में बंबई राज्य को दो भागों में बांट दिया गया और इस तरह हुआ गुजरात का जन्म।
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जब पहली बार गुजरात मे हुआ चुनाव
गुजरात के गठन के बाद यहां 1960 में पहली दफा विधानसभा चुनाव करवाया गया यह चुनाव 132 सीटों पर हुआ जिंसमे से 112 सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी हुई। इस जीत के बाद 1960 से लेकर 1975 तक राज्य की सत्ता पर कांग्रेस का राज रहा। जनता ने उस समय कांग्रेस का भरपूर समर्थन किया और वह उसके कार्यो से संतुष्ट रही। एक मई 1960 से 18 सितंबर 1963 तक राज्य के पहले मुख्यमंत्री कुछ समय के लिए महात्मा गांधी के डॉक्टर रह चुके जीवराज नारायण मेहता थे। इसके बाद पंचायती राज के वास्तुकार माने जाने वाले बलवंतराय मेहता दूसरे मुख्यमंत्री बने। इनकीं मौत के बाद गुजरात की राजनीति में बड़ा परिवर्तन हुआ।
गुजरात मे हितेंद्र देसाई को मुख्यमंत्री बनाया गया और इनके सत्ता में आते ही गुजरात मे पहला साम्प्रदायिक दंगा भड़का इस दंगे के बाद जनता के मध्य कांग्रेस की छवि खराब होने लगी लोग मुख्यमंत्री का विरोध करने लगे और मजबूरी में आकर कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बदला कांग्रेस की ओर से गुजरात का मुख्यमंत्री इस दंगे के बाद चिमनभाई पटेल को बनाया गया। उन्होंने तकरीबन 200 दिन तक सत्ता पर राज किया और फिर तेजी से उठे नव निर्माण आंदोलन के चलते अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद विधानसभा भंग हो गई और गुजरात मे दोबारा चुनाव करवाया गया। कांग्रेस के सत्ता में रहते हुए दंगे ने इस चुनाव में उसकी जीत की राह कठिन कर दी और गुजरात चुनाव के बाद आए रिजल्ट कांग्रेस के विरोध में दिखे अब कांग्रेस सत्ता से हाँथ धो चुकी थी और गुजरात मे एक नए युग का आरम्भ हुआ। बाबूभाई पटेल के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल, समता पार्टी और कांग्रेस से अलग हुई पार्टी कांग्रेस (ओ) की 211 दिनों की सरकार बनी। वही बाबूभाई पटेल गुजरात के गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बन कर उभरे।
आपातकाल के बाद गुजरात की राजनीति
आपातकाल के बाद गुजरात की राजनीति में एक दमदार नेता माधव सिंह सोलंकी की एंट्री हुई माधव ने गुजरात की राजनीति को एक नया मोड़ दिया और वर्ष 1980 में जनता पार्टी की सरकार धराशायी हुई और माधव सिंह सोलंकी गुजरात के नए मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने गुजरात की राजनीति को आर्थिक और पिछडो से जोड़ दिया और उन्हें आरक्षण मुहैया करवाया। राज्य में इसका पूरे जोर शोर से विरोध हुआ दंगो को हवा मिली और 1985 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सोलंकी ने गुजरात मे खाम थ्योरी बनाई थी और उसी के आधार पर सत्ता में आए थे। जब उन्होंने इस रणनीति से गुजरात की राजनीति में कदम रखा तो उन्होंने गुजरात मे 149 सींटें जीती जो सबसे सींटें थी।
गुजरात मे हुई पटेल राजनीति की एंट्री
सोलंकी के इस्तीफे के बाद वर्ष 1990 में गुजरात मे चुनाव हुआ इस चुनाव में भाजपा और जनता पार्टी ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा जनता दल के नेता चिमनभाई पटेल थे और भाजपा ने केशुभाई पटेल को अपना नेता घोषित किया था। उस समय भाजपा यह जान चुकी थी की गुजरात मे दलित मुस्लिम और पिछड़े कांग्रेस के समर्थन में है लेकिन अगर वह पटेल को अपनी ओर कर लेती है तो उसे चुनाव जीतने से कोई नहीं रोक सकता और उसने वही किया। केशुभाई पटेल का मैजिक काम कर गया और पटेल समाज के बलबूते पर गुजरात मे भाजपा और जनता दल सत्ता में आए।
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कब टूटा जनता दल से गठबंधन
भाजपा और जनता दल का गठबंधन राम मंदिर के मुद्दे के चलते टूट गया भाजपा आरम्भ से राम मंदिर के नाम पर राजनीति करती आई है लेकिन उसकी इस रणनीति से जनता पार्टी को समस्या थी और दोनो का गठबंधन बीच मे ही टूट गया। लेकिन इस चुनाव के बाद गुजरात मे भाजपा की एक अलग छवि बन चुकी थी और वर्ष 1995 में हुए विधानसभा चुनाव में 182 सीटों में से 121 सीटें भाजपा के पक्ष में गईं और भाजपा ने पटेल दाव खेलते हुए केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन यह अपना कार्यकाल पूरा नही कर पाए।
मोदी की एंट्री ने बदली गुजरात की राजनीति
वर्ष 2001 में आए भूकंप के बाद जब गुजरात मे मोदी की एंट्री हुई तो गुजरात की राजनीति बदल गई। गुजरात मे मोदी ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया और जनता के मध्य अपनी उम्दा छवि स्थापित की। एंट्री के बाद से मोदी ने गुजरात मे 13 साल तक राज किया और वर्ष 2014 में वह देश के प्रधानमंत्री बन गए। मोदी गुजरात के 22 वें मुख्यमंत्री थे मोदी से पहले या उनके बाद कोई ऐसा मुख्यमंत्री गुजरात मे नही हुआ जो अपना कार्यकाल पूरा कर पाया हो।

