-फरीद वारसी
बात 2017 के विधानसभा चुनाव की है। जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नारा दिया था कि उनका ‘‘काम बोलता है’’। जिस पर तंज करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि जब काम बोलता है तो हाईकोर्ट क्यों बोलता है। गौरतलब है कि कुछ एक मामलों में तब हाईकोर्ट ने अखिलेश सरकार पर टिप्पणी की थी। लेकिन अब समय का चक्र घुमा और हाईकोर्ट ने दयनीय चिकित्सा सेवा के लिए योगी सरकार को खरी-खरी सुनाई है। इलाहाबाद उच्चन्यालय ने गतदिनों गांवों और छोटे शहरों में स्वास्थ्य सुविधाओं पर योगी सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि सब ‘‘राम भरोसे’’ है। वैसे शायद ही कोई भाजपा शासित राज्य हो जहां के हाईकोर्ट ने वहां की सरकारों को आड़े हाथो न लिया है और इसी तरह सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र की मोदी सरकार को महामारी के इस भीषण दौर में विभिन्न मुद्दों पर कई बार कड़ी फटकार लगा चुका है।
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा ही नहीं, बल्कि सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है, जहां कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने भारी तबाही मचाई है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब तीस जिलों की ग्यारह सौ से अधिक किलोमीटर के दायरे में बहती गंगा जो बिहार में निकलती है, उसमें दो हजार से भी ज्यादा शव पाए गए। यह स्पष्ट है कि कोरोना अब गांवांे में भीषण रूप से तबाही मचा रहा है। ग्रामीण इलाकों मंे अधिकांश भारतीय ही रहते हैं। ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य का ढांचा पहले से ही कमजोर है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 499 जिलों में एक भी मेडिकल कालेज नहीं है। और यूपी में तो 75 जिले हैं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि कोरोना की दूसरी लहर ने उत्तर प्रदेश सहित सारे देश की पटरी से उतरी चिकित्सा व्यवस्था की ऐसी पोल खोली कि लोग कोरोना से कम आक्सीजन व इलाज न मिलने से अधिक मरे हैं, यह बात सारी दुनिया में फैल गई। अगर पहली लहर के बाद ही चिकित्सा तंत्र को सुधारने का काम किया जाता तो संभवता यह दिन न देखने पड़ते, जिससे लोग वर्तमान में रूबरू हैं। दुखद तो यह है कि सत्ता में आने के बाद संबंधित सरकारें आमजनता की बुनियादी जरूरतों जो नागरिक के मूल्य अधिकारों में से हैं जैसे सेहत, शिक्षा, रोजी-रोजगार, सड़क व पेयजल मुद्दों पर काम करने के बजाए चुनावी सरोकारों से जुडे़ विषयों पर ध्यान कंेद्रित करती हैं। योगी सरकार को ही लें, यह किसी से छिपा नहीं है कि योगी उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने के बजाए उग्र हिन्दुत्व की अपनी छवि को बरकरार रखने के मकसद से धार्मिक एजेंडे पर काम करने के साथ-साथ एक वर्ग विशेष को हाशिए पर डालने का काम किया तो बुनियादी जरूरतों से जुडे़ मुद्दे कहीं पीछे छूट गए। राज्य की 23 करोड़ जनता को सुरक्षा एवं चिकित्सा देने के वादे तो योगी सरकार ने खूब किए थे, कोरोना कालखंड ने उन तमाम दावों को हवा में उड़ा दिया। जो सरकार अपनी आमजनता को इलाज न उपलब्ध कराए पाए, वह भी महामारी के दौर में तो यह उस राज्य और आमआदमी के लिए किसी बड़े दुर्भाग्य से कम नहीं है। वैसे विपक्ष पिछले काफी समय से बदहाल चिकित्सा व्यवस्था के लिए योगी सरकार को निरंतर घेरने का काम कर रहा है। पर भाजपा सरकारें विपक्ष की सकारात्मक आलोचनाओं को सुनने के बजाए विपक्ष व उसकी आवाज को ही दबाने में विश्वास करती हैं। बहरहाल, हाईकोर्ट ने जिस सख्त लहजे के साथ योगी सरकार को आईना दिखाने का काम किया है ऐसे में उन भाजपा नेताओं सहित गोदी मीडिया को शर्मसार होना चाहिए जो यह कहने से नहीं थकते थे कि कोरोना से निपटने में योगी सरहानीय कार्य कर रहे हैं। वैसे भी योगी सरकार के लिए पंचायत चुनाव परिणामों ने खतरे की घंटी बजा ही दी है। जिसकी गंूज नागपुर स्थित संघ मुख्यालय जरूर पहुंची होगी, जो योगी का प्रशंसक भी है। जो शायद इस गुमान में है कि योगी का चेहरा फिर से भाजपा को सत्ता दिलाएगा।

