जिले में लंपी वायरस की चपेट में हजारों पशु आ चुके हैं। बढ़ते संक्रमण और रोकथाम के लिए पशु पालन विभाग ने एडवायजरी जारी की है। चिकित्सकों का कहना है कि लंपी संक्रमित पशु के दूध को पीने से पहले अच्छी तरह से उबाल ले उसके बाद ही इसको प्रयोग में लाए। लंपी संक्रमित पशु का दूध, बछड़े-बछिया को नहीं पिलाना चाहिए। इसी के साथ ही उनको बचाव के लिए टीका लगवाने आदि सलाह दी गई है। मेरठ में करीब 4 लाख गोवंश है। करीब 500 से अधिक गोवंश में वायरस की पुष्टि हो चुकी है। जबकि इससे कई गुना गोवंश संदिग्ध हैं। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी ने बताया कि गरम व नम मौसम में मच्छर, मक्खी व एक पशु से दूसरे पशु के संपर्क में आने के बाद ही लंपी वायरस फैलता है। यह संक्रमण पशुओं से इंसानों में नहीं फैलता है। उन्होंने बताया कि संदिग्ध पशु की सूचना तत्काल नजदीकी चिकित्सा केंद्र पर दें। इसी के साथ ही टीकाकरण कराएं। 24 घंट के लिए कंट्रोल रूम स्थापित हैं।
लंपी बीमार से ग्रसित पशु को तेज बुखार, आंख व नाक से पानी गिरना, पैर सूजन, कठोर एवं चपटी गांठ से शरीर ढक जाना, पशुओं में चमड़ी घाव, श्वसन तंत्र में घाव, सांस लेने में कठिनाई, वजन घटना, पशु कमजोर होना, गर्भपात और दूध कम होना लंपी वायरस के लक्षण हैं। लंपी बीमारी पशु के बारे में तत्काल पशु चिकित्साधिकारी को जानकारी दें। संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग स्थान पर रखें। संक्रमित पशु का चारागाह हाट आदि में आवागमन बंद करें। मच्छरों, मक्खियों, किलनियों आदि से बचाव में कीटनाशकों का प्रयोग करें। पशुबाड़ा, गोशाला में फिनायल के अलावा सोडियम हाइपोक्लोराइट का छिड़काव दिन में दो बार करें। पशु मेला, पैठ एवं प्रदर्शनी में पशुओं को न भेजें। मृत पशु के शव को खुले में नहीे फेंके। बीमार एवं स्वस्थ पशुओं को एक साथ चारा न डाले।
रोग प्रभावित पशु का दूध बछडे़ और बछियों को न पिलाएं। पशुबाड़े को साफ-सुथरा रखें।

