Zeba Hasan
झूल में आंखें मूंदे बाल हनुमान लेटे हुए मुस्कुरा रहे हैं तो कहीं वह वीणा बजाते हुए वह भक्ति में लीन नजर आते हैं। कहीं उनका विशाल रूप आशीर्वाद दे रहा है तो कहीं उनकी गदा हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ा रही है। जिधर नजर जाती है बस अंजनिपुत्र के रूप ही नजर आते हैं। यह है लखनऊ शहर का हनुमान म्यूजियम। इंदिरा नगर सेक्टर 14 में रहने वाले सुनील गोंबर ने साल 2004 में अपने घर की पहली मंजिल पर इस म्यूजियम को बनाया था। अब सुनील गोंबर तो इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज उनका यह म्यूजियम आज भी बजरंग बली के भक्तों के लिए वरदान से कम नहीं है।
झूले में लेटे हैं बाल हनुमान

कोई तन से दुखी, कोई मन से दुखी, कोई धन बिन रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी, एक सुखी राम का दास…इंदिरा नगर में सुनील गोंबर के घर की सीढ़ियों पर कदम रखने से पहले इन पंक्तियों पर जाती है। घर पहली मंजिल पूरी तरह से अंजनी पुत्र को समर्पित है , जिसकी शुरुआत सीढ़ियों से ही हो जाती है। कदम बढ़ते जाते हैं और हनुमान के अलग अलग रूपों के दर्शन होते जाते हैं। सबसे पहले दीवार पर मधुबनी आर्ट में हनुमान के बाल काल से जुड़ी कहानी का चित्रण किया गया है। इस म्यूजियम में लकड़ी का एक झूला खास है। इसमें आंखें मूंदे हुए बाल हनुमान का रूप देखा जा सकता है। इस वुडन स्कल्पचर को बनाया है लखनऊ की आर्टिस्ट रुचि ने। झूले में हनुमान जी का यह रूप बहुत ही कम नजर आता है। जब महिलाएं इस म्यूजियम में आती है तो बाल हनुमान को झूला जरूर झुलाती हैं।
किताबों के साथ नायाब तस्वीरें भी


करीब नौ सौ किताबों, फ्रेंच रामायण और डॉक्यूमेंटेशन भी जो अब इस कलेक्शन का हिस्सा हैं। सुनील गोंबर ने हनुमान जी से जुड़े कई दस्तावेज विदेश से मंगा कर इस म्यूजियम में रखे हैं। इसके अलावा 18वीं शताब्दी में निकाले गए हनुमान जी की छवि वाले सिक्के की दुर्लभ फोटोज भी हैं। वहीं यहां रखी पेपरमैशी की बनी 7 फीट की गदा भी बहुत खास है। क्योंकि उसपर हनुमान चालीसा अंकित है।
कैसे बना म्यूजियम

हनुमान जी सबके दुख हर लेते हैं। सबकी मनोकामना पूरी करते हैं। मुश्किल वक्त में भक्तों का साथ भी देते हें। हनुमान भक्त सुनील गोंबर का ऐसा विश्वास था कि बजरंगबली ने ही अपने म्यूजियम को लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स 2007 में जगह दिलाई थी। विश्व में इस तरह का यह संभवत: अकेला म्यूजियम है जहां हनुमान के कितने रूप हैं। इसके अलावा हनुमान की पर लिखी गई किताबें, पेंटिंग, म्यूरल्स और फोटोज का नायाब कलेक्शन है। पिता के बाद इस विरासत की देखरेख उनके दो बेटे और पत्नी कर रहे हैं। सुशांत गोंबर कहते हैं कि पिता जी को हनुमान जी में खास प्रेम था। वह स्कूल टाइम से हनुमान जी से जुड़ी वस्तुओं को सहेजा करते थे। उनके पास कई दुर्लभ वस्तुएं थीं जिन्हें वह सबको दिखाना चाहते थे। और यही वजह थी कि उन्होंने इसे म्यूजियम की तरह सहेजने का विचार किया और घर के ऊपरी हिस्से में 2004 में म्यूजियम बना दिया। जिसका इनॉगरेशन तत्कालीन राज्यपाल विष्णु शास्त्री ने किया था। इस म्यूजियम को पब्लिक के लिए हर संडे को ओपन किया जाता था। इस हनुमान म्यूजियम के बारे में सुनकर लोग देश विदशे से इसे देखने के लिए आते हैं। उनके फीडबैक से यहां की विजिटर बुक भी भर गई हैं।

कोरोना के बाद से नहीं है वह रौनक

सुशांत कहते हैं कि जब कोरोना काल की शुरुआत हुई थी तब हमने इस म्यूजियम को विजिटर के लिए बंद कर दिया था। एक साल पहले पिता जी 26 अप्रैल को यह दुनिया छोड़ कर चले गए थे। उनके और हनुमान जी के प्रेम के बारे में इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हनुमान जयंती की पूर्व संध्या थी जिस दिन उनका देहांत हुआ था। अब जब कोई फोन करके इस म्यूजियम को देखने के लिए कहता है तो हम इसे खोलते हैं। जहां तक इसकी देखभाल का सवाल है तो हम पूरा ध्यान देते हैं। कहीं कुछ हनुमान जी से जुड़ी जीचें मिलती हैं तो वह भी कलेक्ट करते हैं। पिता जी ने तो विदेश तक से दस्तावेज मंगाए थे। जॉब की वजह से हम दोनों भाई को लखनऊ से बाहर रहना पड़ता है। मां भी हमारे साथ रहती हैं। पिता जी के जाने के बाद से हालात बदल गए हैं वह रौनक तो नहीं लेकिन जब हम शहर में होते हैं तो जो आना चाहता है उसे हम दर्शन जरूर कराते हैं।

