नई दिल्ली। गोमुख गंगाजल को जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी जीआइ टैग दिलाने के लिए जिनेवा में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की मिनिस्ट्रियल कांफ्रेंस के मंच से पैरवी की गई। इसमें 164 देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष चरक संहिता से लेकर वर्ष 1806 से 1906 के बीच अंग्रेजों द्वारा करवाए शोध सहित लगभग एक हजार पेज के दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। देश के 26 उत्पादों को जीआइ टैग दिलाने के बाद गंगाजल की दावेदारी पेश करने वाले ग्रेट मिशन ग्रुप कंसलटेंसी के प्रमुख प्रोफेसर गणेश शंकर हिंगमिरे ने ये कोशिश की है। हिंममिरे ने बताया कि गोमुख गंगाजल को भौगोलिक सांकेतिक धरोहर के रूप में मान्यता हर हाल में मिलेगी। लगभग 21 साल से जीआइ टैग, बौद्धिक संपदा अधिकार और पेटेंट पर काम कर रहे हिंगमिरे ने 40 उत्पादों के लिए जीआइ टैग आवेदन किया है। जिसमें से 25 फीसदी उत्पाद कृषि से संबंधित है। लंदन में रहे प्रोफेसर हिंगमिरे के मुताबिक गंगाजल को जीआइ टैग दिलाने के लिए दस्तावेज जुटाने का काम पिछले सात वर्ष पहले शुरू किया गया था। गंगाजल एंटीबैक्टीरियल है। इसको प्रमाणित करने के लिए चरक संहिता को सामने रखा गया। जिसमें बताया गया है कि पुराने समय में शल्य चिकित्सा के दौरान गंगाजल का उपयोग किया जाता था। प्रो. हिंगमिरे के मुताबिक गंगा जल पर अंग्रेजों ने वर्ष 1806, 1896, 1901 और 1906 में शोध किए थे। जिसमें बताया गया था कि गंगाजल में नैसर्गिक औषधीय गुण मिले हुए हैं। इस बात के प्रमाण हैं कि एंटीबैक्टीरियल क्षमता से भरपूर होने पर ही मरणासन्न व्यक्ति के मुंह में गंगाजल डाला जाता था। हालांकि जागरूकता के अभाव में गंगाजल का स्वरूप बदला है।
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गंगाजल को जीआइ टैग की पैरवी के लिए डब्ल्यूटीओ के मंच को चुनने के पीछे का कारण बताते हुए प्रोफेसर हिंगमिरे ने कहा कि वो अब तक डब्ल्यूटीओ की सात कांफ्रेस में भाग ले चुके हैं। वर्ष 2003 में टकीला को जीआइ टैग के लिए इसी तरह डब्लूटीओ के मंच से पेश किया था। उसके बाद इसे दुनियाभर में पहचान मिली। उसके बाद से ही उन्होंने सोच लिया कि गंगाजल को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए इसी मंच का सहारा लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि शुद्ध पानी की पीएच वैल्यू सात बताई जाती है। गंगा जल के जीआइ टैग के आवेदन में बताया है कि गोमुख से निकले गंगा जल की पीएच वैल्यू 7.18 से 7.5 के बीच है। जोकि वास्तविक रूप से शुद्धजल है।
