मेरठ। प्रदेश में 2017 में भाजपा सरकार आई तो गोकशी पर पुलिस की सख्ती हुई। नतीजा 2017 के बाद गोकशी पर सख्ती हुई तो गोकशों ने पुलिस की गोली के डर से अपना धंधा ही बदल दिया। आज पश्चिमी उप्र में ग्रामीण ही नहीं पुलिस भी सकून से हैं।
आए दिन खेतों में मिलते थे गोवंश होते थे हंगामें
मेरठ हो या फिर पश्चिमी उप्र का कोई जिला। मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद और आगरा मंडल के जिलों में गोकशी की घटनाएं आम थी। 2017 से पहले इन मंडलों के जिलों में कोई थाना या कस्बा ऐसा नहीं होता था जहां पर रात में गोकशी की घटनाएं नहीं होती हो।
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गोकशी की खुलेआम होने वाली घटनाओं के बारे में थाने को जानकारी न हो ऐसा नहीं था। थानाक्षेत्रों में गोकशी होने से पहले ही प्रति पशु उसका पैसा पहुंचा दिया जाता था। सुबह ग्रामीणों को अपने खेतों में गोवंश के शरीर के बेकार टुकटे मिलते थे। जिन्हें पुलिस ग्रामीणों की मदद से ही खेत में दबवा देती थी।
पश्चिमी से होती थी पूरे देश में मीट की बड़ी सप्लाई
पश्चिमी उप्र गोकशी का एक बड़ा हब बना हुआ था। यहां से प्रतिदिन सैकड़ों टन मीट की सप्लाई देश के विभिन्न प्रांतों में होती थी। अकबर बंजारा जैसा गोकश जो कि मात्र दस साल में ट्रक चालक से करोडों रुपये का सम्राज्य स्थापित कर लिया। वह भी यहां से खुलेआम गोवंश की सप्लाई पूर्वोत्तर राज्यों से होकर बांग्लादेश और म्यामार तक करता था। मेरठ और आसपास से गोकशी कर मीट दूसरे राज्यों और यहां तक कि विदेश में एक्सपोर्ट करने वाले एक्सपोर्टर तक भेजा जाता था। गोकश इसके लिए बकायदा इंसुलेटेड एसी वैन का प्रयोग करते थे।
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योगी सरकार बनने के बाद खाकी पर पड़ा दबाव तो हुए गोकशों के एनकाउंटर
2017 में भाजपा की सरकार आई और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी बने तो जैसे गोकशों पर कहर ही टूट पड़ा। सीएम योगी ने सबसे पहले अपने पुलिस महकमें को दुरूस्त किया उसके बाद गोकशों पर अंकुश लगाने की शुरूआत की। नतीजा ये हुआ कि मेरठ और आसपास के जिलों में एक दिन में दो से तीन मुठभेड़ गोकशों के साथ होनी शुरू हुई। जिसमें गोकश खाकी की गोली का शिकार होने लगे। पुलिस के आपरेशन लंगडा से गोकशों की कमर टूट गई।
गोली के डर से धंधा छोड़ बेच रहे सब्जी,आइसक्रीम और फल
मेरठ के किठौर क्षेत्र के रहने वाले एक गोकश से हुई मुलाकात के बाद बहुत कुरेदने पर पता चला कि वो लोग कभी लग्जरी गाडियों में घूमते थे। एसी लग्जरी गाडियों में घूमना और शापिंग के लिए दिल्ली और गुरूग्राम जाना इनका शगल था। लेकिन आज गोली के डर से ये लोग गोकशी का धंधा छोड़कर सब्जी,आइसक्रीम और फलों का ठेला लगाकर दिन काट रहे हैं। ये सिर्फ एक गोकश की कहानी नहीं है। उन हजारों गोकशों की रोजमर्रा की जिंदगी है जो कि गुमनाम हैं और पुलिस की गोली से बचे हुए हैं। जबकि उनके कई साथी आज पुलिस की गोली से लगने से एक पैर से अपाहिज होकर घर पर पड़े हुए हैं।

