नई दिल्ली। कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी का इंतकाल हो जाने से घाटी में अलगाववादी मिशन को और करारा झटका लगा है। घाटी में तीन दशकों तक अलगाववाद और खून-खराबे की नींव रखने वाले गिलानी की अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में खून-खराबा न करवाना सीमापार के आकाओं को नागवार लगा था। ऐसे में पाकिस्तान ने उनसे किनारा कर लिया और बाद में आखिरकार गिलानी को हुर्रियत से अलग होना पड़ा था।
पड़ोसी देश पाकिस्तान के नाता तोड़ लेने पर गिलानी ने जून 2020 में यानि 27 बरस के बाद हुर्रियत कांफ्रेंस से रिश्ता तोड़ लिया। पाकिस्तान को एहसास होने लगा था कि अब उनका प्रयोग खत्म हो चुका है। ऐसे में पड़ोसी देश समय बीतने के साथ मिलाने से अपना समर्थन हटाते गए। इसी दौरान उनकी इच्छा से विपरीत पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में हुर्रियत प्रमुख का इलेक्शन किया जाना भी गिलानी को पसंद नहीं आया।
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धारा 370 के हट जाने की स्थिति में पाकिस्तान को उम्मीद थी कि हुर्रियत घाटी को फिर खून-खराबे में जलाने लगेगा, पर न तो किसी अलगाववादी नेता ने किसी प्रकार की मुखालफत का ऐलान किया और न ही पत्थर चले। और तो और यहां पाकिस्तान के झंडे भी लहरा कर किसी ने विरोध जताने की हिम्मत नहीं की। ऐसे में पाकिस्तान को काफी बुरा लगा। उसकी हताशा गिलानी को नजरअंदाज करने के रूप में सामने आयी। इसके बाद अपनी पकड़ कम होते ही गिलानी ने भी खुद को हुर्रियत से दूर कर लिया।
सच पूछा जाए तो पहले, हुर्रियत की एक अपील पर घाटी में सब कुछ ठप पड़ जाता था। यहां तक कि, नजरबंदी के बावजूद गिलानी के नाम से जब फतवे जारी होते तो उसका असर हो जाता। याद कीजिए 2016 में जब हिजबुल सरगना बुरहान वानी मारा गया तो घाटी में कई महीनों तक खून-खराबे का सिलसिला चला। यही माना गया कि, अलगाववादियों ने ही इस हिंसा का तानाबाना बुना।
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बता दें कि, बीते 22 अगस्त को गिलानी के हैदरपोरा घर लगा तहरीक-ए-हुर्रियत का बोर्ड भी हटा दिया। कहते हैं कि, कानूनी एक्शन से बचने के लिए यह कदम उठाया गया था।

