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यूपी चुनावी दंगल 2022 : चार बार की मुख्यमंत्री मायावती 2022 में लड़ रही अस्तित्व की लड़ाई


यूपी चुनावी दंगल 2022 : चार बार की मुख्यमंत्री मायावती 2022 में लड़ रही अस्तित्व की लड़ाई

धीरज उपाध्याय

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के घमसान में अगर कुछ अधूरा (मिसिंग) लग रहा  है तो वो है बसपा सुप्रीमों मायावती और उनकी पार्टी की सक्रियता। यूपी की 4 बार की मुख्यमंत्री रही मायावती के आगामी विधानसभा चुनावों में लो प्रोफाइल रहने से राजनीतिक पंडित भी हैरान हैं। हालांकि उन्होने 2 फरवरी को आगरा में रैली कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अंतिम प्रयास किया है लेकिन शायद अब बहुत देर हो गयी है जिसे अंग्रेजी में (टू लिटल टू लेट) कहते है।

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राजनैतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2022 विधानसभा चुनाव मायावती के शानदार राजनीतिक करियर का अंतिम चुनाव भी साबित हो सकता है। हालांकि उनके जैसे नेता के राजनैतिक अंत की भविष्यवाणी करना आसान नहीं है  जिसने अपने करियर के शुरुआती दौर में इतनी सारी बाधाओं और असफलताओं को पार कर सत्ता की सीढ़िया चढ़ी हो राजनीतिक कामयाबी हासिल की हो।

हालांकि पिछले कई चुनावों में भले ही बसपा बुरी तरह से पराजित हुई है लेकिन कमोवेश उसका अपना कोर वोटर उसके साथ खड़ा रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से उसका कोर जाटव (दलित) वोटर भी उससे छिटकता दिखा रहा है जबकि गैर जाटव वोटर 2014 के बाद से यूपी में भाजपा के खेमें के साथ खड़ा दिखायी दे रहा है।

बसपा और मायावती के पतन के कारण

लगातार मिली कई चुनावी हार से मायावती और बसपा दोनों कमजोर हुई है। बसपा ने अपना जनाधार 2009 लोकसभा चुनावों से खोना शुरू कर दिया था। जिससे उनके प्रधान मंत्री बनने के सपने को धक्का लगा था, फिर 2012 में अखिलेश यादव के हाथों मिली शिकस्त से उनके राजनीतिक वर्चस्व को और नुकसान पहुंचा। वहीं 2014 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं जीत पाने के बाद 2017 के विधानसभा चुनावों में महज 19 सीटों पर सिमट जाने से बसपा का किला और दरक गया। हालांकि 2019 में सपा के साथ गठबंधन कर बसपा को संजीवनी मिली और उसने 10 लोकसभा सीटे जीती जबकि सपा को केवल 5 सीटो से संतोष करना पड़ा था।

बतादे कि बड़ी संख्या में उसके जमीनी और दिग्गज नेताओं का पार्टी छोड़ चले जाना भी बसपा के पतन का प्रमुखा कारण है। बड़े नेताओं जैसे इंद्रजीत सरोज, स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, रामअचल राजभर और लालजी वर्मा के पार्टी छोड़ने से मायावती और उसके वोटरों के बीच संपर्क लगभग टूट सा गया है।

दूसरा मायावती ने कभी नेताओं की दूसरी लाइन नहीं तैयार की जिसका खामियाजा पार्टी को बड़े नेताओं के छोड़ने पर उठाना पड़ रहा है। साथ ही चुनाव आयोग द्वारा रैली पर रोक से भी बसपा को नुकसान होता दिख रहा है क्योंकि बसपा का अधिकतर वोटर ग्रामीण है जिसके पास संपर्क के सीमित साधन है। मायावती की निष्क्रियता से भी उसके समर्थको में निराशा का भाव है और वो पाला बदलने की फिराक में है।

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जानकारों के मुताबिक इस बार भी मायावती 2007 वाला सोशल इंजीनीइरिंग फार्मूला दोहराना चाहती है लेकिन परिणाम वैसे आते नहीं दिख रहे है। वहीं अगर रिसर्च एजेंसियों कि माने तो बसपा इस बार दहाई के आंकड़े तक सीमित रह सकती है। जिससे ये कहना गलत नहीं होगा कि मायावती का राजनैतिक अस्तित्व अब खतरे में है।

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