मेरठ: हृदय की प्रक्रियाएं यहां तक कि अत्यधिक कुशल डॉक्टरों के लिए भी बेहद जटिल हो सकती हैं, और इससे जुड़े जोखिम को कम करने का एक तरीका अस्पताल में हाइब्रिड ऑपरेटिंग सिस्टम का होना है, जहां एक ही ऑपरेशन रूम में कार्डियोलॉजी और कार्डियक सर्जरी प्रक्रियाएं की जा सकती हैं।
भारतीय डॉक्टर भारत में विश्वस्तरीय अत्याधुनिक तकनीक लाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहे हैं। अस्पतालों की अच्छी तरह से प्रशिक्षित और अत्यधिक कुशल मल्टी-स्पेशियलिटी कार्डियक टीमें मरीजों की जान बचाने के लिए इस तरह की जटिल सर्जरी को जल्द से जल्द कर रही हैं।

ऐसी ही एक प्रक्रिया हार्ट इंस्टीट्यूट मेदांता – द मेडिसिटी के इंटरवेंशनल एंड स्ट्रक्चरल हार्ट कार्डियोलॉजी के चेयरमैन डॉ. प्रवीण चंद्रा ने की है।
73 वर्षीय पुरुष को उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) की शिकायत थी और वह गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस (वाल्व लीफलेट्स पर कैल्शियम जमा होने के कारण हृदय में एओर्टिक वाल्व का संकुचित होना) से पीड़ित थे। उनका फ्लोरोस्कोपिक गाइडेंस के तहत एडवर्ड सेपियन – 3 टीएवीआर प्रक्रिया होनी थी। लेकिन रोगी को गुर्दे की गंभीर बीमारी भी थी, जिसके कारण प्रक्रिया और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गयी।
हार्ट इंस्टीट्यूट मेदांता – द मेडिसिटी के इंटरवेंशनल एंड स्ट्रक्चरल हार्ट कार्डियोलॉजी के चेयरमैन डॉ. प्रवीण चंद्रा ने कहा, “इस मरीज के दिल ने काम करना बंद कर दिया था, और सीपीआर (चेस्ट कंप्रेशन) के बाद उसे पुनर्जीवित किया गया था। उसे मेदांता-द मेडिसिटी में हमारे पास लाया गया, जहां उसे प्राथमिक उपचार मिला और अस्पताल में भर्ती होने के 48 घंटों के भीतर, उसका टीएवीआर के साथ इलाज किया गया। इस रोगी में बाइकस्पिड एओर्टिक वाल्व (सामान्य एओर्टिक वॉल्व में तीन लीफलेट की बजाय उनके एओर्टिक वॉल्व में दो लीफलेट) था। यह रोगी ओपन-हार्ट सर्जरी के लिए अत्यंत उच्च जोखिम वाला था। टीएवीआर प्रक्रिया के बाद हमें बहुत अच्छे परिणाम मिले, क्योंकि मीन ग्रेडिएंट 4 पोस्ट प्रक्रिया थी, इसका मतलब है कि नया प्रत्यारोपित वाल्व प्रक्रिया के तुरंत बाद पूरी तरह से काम कर रहा था। वाल्व से कोई रिसाव नहीं, कोई पेसमेकर नहीं, कोई वैस्कुलर जटिलता नहीं और कोई दुष्प्रभाव नहीं हुआ। प्रक्रिया के तीसरे दिन रोगी खुशी-खुशी घर चला गया; अस्पताल से जाते समय वह बिल्कुल सामान्य था और अगले कुछ दिनों के भीतर ही वह अपनी नियमित गतिविधियों को फिर से शुरू करने में सक्षम था। यह प्रक्रिया भारत में बहुत ही सफल और सबसे तेज टीएवीआर प्रक्रिया थी।ʺ
फेफड़ों में ऑक्सीजन से शुद्ध होने वाला रक्त हृदय में आता है। यहां से, शरीर के बाकी हिस्सों में शुद्ध रक्त की आपूर्ति के लिए इसे महाधमनी (एओर्टा) में पंप किया जाता है। एओर्टिक वाल्व नामक वाल्व इस प्रवाह को नियंत्रित करता है। माइट्रल वाल्व और ट्राइकसपिड वाल्व हृदय के दोनों किनारों में रक्त के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। जब इनमें से कोई भी वाल्व ठीक से नहीं खुलता है, तो उन्हें बदलने की आवश्यकता होती है – और अब यह ओपन-हार्ट सर्जरी के बिना किया जा सकता है। प्रक्रियाओं को ट्रांसकैथेटर माइट्रल वाल्व रिप्लेसमेंट (टीएमवीआर), ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व रिप्लेसमेंट (टीएवीआर) या ट्रांसकैथेटर ट्राइकसपिड वाल्व रिप्लेसमेंट (टीटीवीआर) कहा जाता है।
इस तरह की हृदय प्रक्रियाएं, और कई अन्य प्रक्रियाएं बहुत जटिल हो सकती हैं। दिल की प्रक्रिया के दौरान, रक्तस्राव, संक्रमण, दिल की अनियमित धड़कन के कारण जटिलताएं, दिल की विद्युत की समस्याएं, और कभी-कभी दिल का दौरा या स्ट्रोक होने का भी खतरा होता है। ऐसा बहुत कम ही होता है, लेकिन सबसे अच्छी मेडिकल टीम वे होती हैं जो दुर्लभतम घटनाओं के लिए भी तैयार रहती हैं। सभी प्रक्रियाओं के सफल होने के लिए सही डॉक्टरों के अलावा, सही उपकरण और उच्च सुरक्षा मानकों की आवश्यकता होती है। और इसीलिए, हृदय की देखभाल वाले किसी भी अस्पताल के लिए एक हाइब्रिड ऑपरेटिंग रूम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

